पिछली पोस्ट से आगे...
अब जरा एक नजर अवचेतन के इतिहास पर डाले. मनुष्य ने अपनी चेतना बहुत धीमी गति से कठिन प्रक्रिया के उपरांत विकसित की है. एक ऐसी प्रक्रिया जिसमे कई शताब्दियाँ एक सूक्ष्म से परिवर्तन की साक्षी बनी या की बनते -बनते रह गई. आदिम मानव द्वारा तार्किक सचेतन से परे एक अवचेतन की उपस्थिति के प्रमाण लगभग सभ्यता के आरम्भ से ही उपलब्ध हैं, पर इसका दस्तावेजीकरण तब संभव हुआ जब मनुष्य ने लिपि के अविष्कार(about 4000 BC) के बाद अपने अनुभवों को लिपिबद्ध करना आरम्भ किया.
वह सुस्पस्ट वियोजन आदिमानव विश्लेसित कर पाने में असक्षम था. फिर उसे कैसे परिभाषित करता? जाहिर बात है ज्ञात अवधारणाओं को आधार बनाकर, उसकी कसौटी पर. अवचेतन की इस गुत्थी को संक्षेप में नही सुलझाया जा सकता. यहाँ एक प्रसंग को व्याख्यायित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है, जिसे आगे के कई विश्लेसनों में संदर्भित करने की मेरी योजना है.आज के आधुनिक मानव के व्यवहार को परिभाषित करने से पहले हमें उसके वनैले पूर्वजों के व्यवहार को थोडा जानना होगा जिससे की हम उस आदिम मानसिकता को आज के परिवेश में ठीक प्रकार पहचान लें और नियंत्रित कर सके(योजना तो कुछ ऐसी ही है).
मूल विषय पर लौटते हुए ..क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया की आपका गोत्र क्या है?
निहायत ही मुर्खता पूर्ण प्रश्न है, विज्ञान (वह भी मनोविज्ञान की आधुनिक शाखा "फंसनल साइकोसिस") के सन्दर्भों में इन वाहियात बातों का क्या तुक? किसी जवाब की अपेक्षा करूँ ? चलिए अपना जवाब फिर कभी दीजिएगा अभी मैं आपकी सोंच को दिशा दे रही हूँ.
आप उरावों अथवा किसी भी आदिम जनजाति के बीच जाइए ..उनसे पूछिए उनका गणचिन्ह क्या है, वे किसी भी जानवर अथवा खाद्य पदार्थ (प्राकृतिक रूप से उपलब्ध - फल सब्जी) का नाम लेकर कहेंगे की यह हमारा टोटेम है..और हम इससे ही जन्मे हैं इसलिए हमें यह खाना निषिद्ध है और क्योंकि इसी चिन्ह से जन्मे दुसरे लोग हमारे भाई/-बहन हैं इसलिए उनसे विवाह की मनाही है. यह एक अन्धविश्वाश है (कैसे प्रचलन में आया इसपर फिर कभी बात होगी ). पुरातन आदिम समूहों में भी यह मान्यता थी( और बड़े जोर शोर से थी) ..माना जाता था किसी का टोटेम अगर भालू है और उसने (अथवा किसी और ने उसके समक्ष) किसी भालू को चोट पहुंचा दी तब उस इन्सान को भी उतनी ही चोट पहुंचेगी और दर्द होगा. कालांतर में जैसे जैसे मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा हम देख सकते हैं देवताओं की शक्लों ने इन जानवरों से काफी कुछ अधिग्रहित कर लिया (अभी के आधुनिक देवताओं में भी यह तथ्य देखा/परखा जा सकता है). यह विश्वाश बहुत ही ढृढ़ था. कई बार इसे लेकर खुनी लड़ाइयाँ भी हो जाती. जाहिर बात है ऐसे समाज में जहाँ करने को बहुत कम कार्य हो(सिर्फ शारीरिक जरूरतें हो) जब किसी में विचलन/वियोजन (चेतना का लोप) उत्पन्न होता कह दिया जाता की इसने देवता अथवा टोटेम का अपमान किया होगा(टोटेम के संबध में चोट पहुँचाया पढ़ा जाए).
इससे यह निष्कर्ष निकाला गया की मनुष्य में एक "बुरी आत्मा" (कभी कभी अच्छी और कृपालु भी ) का निवास भी होता है जो मानसिक विचलन/वियोजन के समय प्रकट होती है. इसके प्रभाव सामूहिक रूप से मास हिस्टीरिया(सामूहिक मानसिक वियोजन) के वक्त भी देखे गए हैं जिसपर चर्चा आगे की जाएगी.
आज के लिए इतना ही ..शेष चर्चा फिर कभी ..
पिछली कड़ियाँ ..
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 1
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 2
- Lovely kumari





