Monday, May 18, 2009

बारिश देखिये और उसके बाद बना हुआ तालाब

आज हमारे यहाँ जमकर बारिश हुई, ओले पड़े और हालात ऐसे हो गए की ३ फिट गहरा तालाब हमारे सरकारी क्वाटर के आस पास प्रकट हो गया.
आज और कुछ नही बारिश देखिये और उसके बाद..
video

बना हुआ तालाब.

और हाँ.. दोस्तों, भाइयों और बहनों टिप्पणी -सिप्प्नी करने की जरुरत नही जाने किसे परेशानी हो जाये :-)

Tuesday, April 28, 2009

एक विद्रोहिणी की डायरी - स्त्रीत्व सम्मानजनक या अपमानित करने का साधन ?

यह उन दिनों की बात है जब, मैं बारहवीं कक्षा में थी. एक नेताजी ने कुछ स्त्री विरोधी बाते कह दी. चारो ओर से विरोध में स्वर उठने थे उठे. उन दिनों मेरा सामाजिक सरोकार जरा कम हुआ करता था. सीनियर लड़कियों ने उपरोक्त नेताजी को अपमानित करने के लिए साडी और चूड़ी भेजने का एलान किया. मैंने सोंचा इनकी सोंच का भठ्ठा ऐसे ही तो नही बैठ सकता, थोडी खोज-बिन करने पर जानकारी मिली की सामने के ब्वायज कॉलेज के लड़कों ने इनकी बुद्धि के ताबूत में आंखरी किल ठोंकी है. उन्ही के सहयोग और सह पर यह आयोजन हो रहा है. आनन -फानन में स्थानीय मिडिया को भी बुलाया गया. मुझे भी खबर मिली..मैं हमेसा की तरह १० मिनट लेट से (आयोजनों में देर से पहुँचने की बुरी आदत की शिकार हूँ ) पहुंची. मैंने जो दृश्य सामने देखा मेरा दिमाग उसे स्वीकार नही कर पाया. बैनर पोस्टर टंगे थे नेता का नाम लेकर "चुल्लू भर पानी में डूब मरो " टाइप...और सामने साडियां और चूडियाँ पड़ी थी.
छात्र नेताओं को तो मैंने कुछ नही कहा. मैंने महिला कॉलेज की छात्राओं से पूछा,
-"आप इस नेता को स्त्रीत्व की यह निशानियाँ भेज कर अपमानित करना चाहती हैं, क्या मैंने सही समझा ?"
जवाब आया -"हाँ, तुमने सही समझा"
-"यानि की स्त्री होना या यह स्त्रीत्व चिन्ह धारण करना शर्म से डूब मरने की बात है, आपने खुद को क्या समझ कर यह आयोजन यहाँ किया है?"
सब लोग चुप हो गए. मैंने उसी वक्त उठ कर घर चली आई. दोस्त ने बताया की जैसे - तैसे नजरें नीची करके आयोजन निपटा और लोग अपने घर चले गए.
मैं तब से अब तक सोंचती हूँ ..कभी किसी स्त्री को अपमानित या उसका सामाजिक बहिष्कार करने के लिए पुरुष के कपडे क्यों नही भेजे जाते?
क्यों एक तरफ लोग कहते हैं यह गहने -कपडे हमारी परम्परा है ..और दूसरी तरफ इसी परम्परा को अपमानित करने का साधन बनातें हैं? स्त्रीत्व को स्त्री के सामने गौरवशाली होने का पैमाना बताया जाता है, पर पुरुषों के बीच "क्या चूडियाँ पहन रखी है तुमने", "अरे क्या लड़कियों की तरह रोता है " जैसे मुहावरे बोले जाते हैं ..फिर किस तरह स्त्रीत्व को मैं गौरवशाली होने का पैमाना मानूं ?
मुझे मेरे समाज का यह दोगलापन समझ नही आता ..क्या आपको आता है ?

Saturday, April 25, 2009

एक विद्रोहिणी की डायरी - नाम में क्या रखा है

नाम में क्या रखा है??
मुझे मेरे नाम को लेकर बहुत लोगों से अलग -अलग प्रतिक्रिया मिली है.
जब मैं दूसरी कक्षा में नामांकन करवाने गई थी (पहली कक्षा मैंने नही पढ़ी है) तब मास्टर जी ने माँ से कहा "क्या मैडम कोई हिंदी नाम नहीं मिला आपको, जो बिटिया का नाम लवली रख दिया?"(मेरी माँ कैसे कहती यह नाम उसकी प्रिय सहेली का दिया हुआ है जो अब इस दुनिया में नही है)
वह चुप रही बोली : जो भी हो आपको यही लिखना है.
फिर मैं पढ़ती रही नए -नए अनुभवों से गुजरती रही ..हर बार नाम बदल देने की सलाह मिलती रही मुझे (क्योंकि यह नाम अजीब है, भारतीय नही है). मैं इन सब को अनसुनी करती गई. मुझे आदत हो गई थी इस नाम की. यह मुझे मेरी पहचान बताता था. फिर - फिर मौके आते रहे. मैं अपने नाम के साथ रही.
फिर मैंने सौभाग्यवती होने का वरदान पाया. उनके उनके आगमन से जीवन में नयी सुबह आई. मैं विद्रोहिणी थी, मैंने फिर भी अपनी पहचान के साथ समझौता करने से इंकार किया. वो एक संवेदनशील पुरुष हैं ..उन्होंने जीवन के हर मोड़ पर मेरा साथ दिया. उन्हें पा के मैं पूर्ण हुई...और मैं आज भी अपनी पहचान के साथ हूँ.
मैंने नाम नही बदला है.मैंने पहचान नही खोई.
आप सोंचिये आज मैं अपने रिश्ते पर गर्व कर पाती हूँ क्योंकि मैंने एक संवेदनशील इन्सान का साथ पाया है ..अगर इतनी थोडी सी बात किसी को इतनी खुसी दे सकती है तो, बाकि सारे नियम गौण नही हो जाते? क्यों हम सामाजिक ताने - बाने को बदलने से पहले इतना सोंचते हैं? क्या गलत को गलत कहने में हर्ज है ..अगर हाँ तो मुझे बताएं क्यों?

Thursday, April 23, 2009

रवीश जी और विवाह प्रस्ताव

क़स्बा वाले रवीश जी ने आज (23-एप्रिल) हिंदुस्तान अख़बार की ब्लॉग वार्ता में मेरे नाम का जिक्र किया है. जब मैंने ध्यान से पढ़ा तो पाया की मेरे ब्लॉग के यु. आर. एल की जगह उन्होंने अमर जी के इस ब्लॉग का यु. आर. एल. छांप दिया है.









आशा करती हूँ अमर जी का विवाह प्रस्ताव स्वीकार हो गया होगा.

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एक आशा और है, क्या पता पूरी हो या नही ..रवीश जी से अनुरोध है अगली बार अमर जी का नाम दे कर इस गलती को सुधार लें.

Tuesday, April 21, 2009

किसी ने जब मुझसे पूछा "प्यार क्या है" बता सकोगी?

जब प्यार तुम्हे पुकारे तुम उसके पीछे चल दो. चाहें उसके रास्ते घने जंगलों से दुर्गम और सीधी चट्टानों से दुरूह हो. जब उसके पंख तुम्हे समेट लें तो खुद को उसके हवाले कर दो. हो सकता है उसके पंखों में छिपी तलवार तुम्हे घायल कर दे...पर जब वह तुम्हे कुछ कहे उसका विश्वास करो. चाहे उसकी आवाज तुम्हारे सपनो को चकनाचूर कर दे ..जैसे बर्फीली हवा बाग़ उजाड़ देती है ..फिर भी ..क्योंकि प्यार जहाँ ताज पहनता है वहाँ सूली पर भी चढ़ता है ..विकास करता है तो तराशता भी है...वह जैसे तुम्हारी उचाइयों तक पहुंचकर धुप में झूमती नाजुक टहनियो को सहलाता है ,वैसे ही धरती से लिपटी हुई तुम्हारी जड़ों तक पहुंचकर उन्हें झकझोर देता है.अनाज की फूलो की तरह तुम्हे खुद में समेत लेता है. तुम्हे अनावृत करने के लिए गहता है ..भूसी से मुक्त करने के लिए फटकता है. उजला बनाने के लिए पिसता है. जब तक तुम लचीले न बन जाओ तब तक गूंथता है. फिर अपनी पवित्र ज्वाला में सकता है ताकि तुम ईश्वर के पावन भोज के लिए पुनीत बन जाओ. प्रेम तुम्हारे साथ यह सब करेगा ताकि तुम अंतरतम के रहस्यों को जान सको. चैतन्य के ह्रदय का भाग बन सको. ..पर अगर तुम्हे डर लगता है और तुम प्रेम में सिर्फ शांति और उल्लास की कामना करते हो तो बेहतर होगा की तुम आवरण ओढ़ कर प्रेम के इस खलिहान से बाहर चले जाओ. उस ऋतुहीन दुनिया में चले जाओ जहाँ तुम हंसोगे पर खुल के नही..रोओगे पर सारे आँशु न बह पाएंगे. प्रेम और किसी को नही खुद को ही देता है ..और किसी से नही खुद से लेता है.
प्रेम न किसी पर कब्जा करता है न खुद पर किसी का कब्जा पसंद करता है...क्योंकि प्रेम अपने में पूर्ण है. जब तुम प्यार करते हो यह मत कहो ईश्वर मेरे दिल में है ...कहो ..मैं ईश्वर के दिल में हूँ. मत सोंचो की तुम यह राह तय करने योग्य हो ..अगर प्यार तुम्हे इस लायक समझेगा तो वह खुद तुम्हे रास्ता दिखायेगा. अगर तुम प्यार करो और तुम्हारी चाहतें हो तो वह चाहतें इस प्रकार की हो :- की तुम पिघलो और बहो उस झरने की तरह जो रात के लिए मधुर गीत गाता है ..तुम बहुत अधिक कोमल होने की पीड़ा जान सको ..तुम प्यार के बारे में अपनी समझ से ही घायल हो जाओ .बहने दो अपना रक्त स्वेच्छा से आनन्द से. सुबह जागो तो ऐसे जैसे दिल को पंख लग गएँ हैं...और प्यार का एक और दिन पाने के लिए ईश्वर को धन्यवाद दो.शाम को घर लौटो शांत लहरों के साथ कृतज्ञ भाव से फिर सोओ तो प्रिये के लिए दिल में प्रार्थना हो और ओंठों में प्रशंसा के गीत.



खलील जिब्रान

Monday, March 30, 2009

उन्मुक्त शंखनाद

अपशब्द सुनने को मैं तैयार हूँ
दुश्चरित्र कहो या कुल कलंकिनी
मुझे कष्ट की नहीं परवाह है
आहुति बनने का प्रण कर लिया है
तोड़ के पूर्वाग्रहों की बेडिया
मैंने विद्रोहिणी बनने का मन कर लिया है

मेरा दोष क्या था बताओ
मुझ अबला को अपशगुनी कहा गया
उजड़ा मेरा ही सुहाग
मुझे ही दोषी बना दिया गया
क्यों मुझे अपनी ही आत्मजा का
कन्यादान नही करने दिया गया

क्यों न दे पाई मुखाग्नि मैं अपने पिता को
क्या इसी तरह की परम्परा में पुत्र ने
उत्कृष्टता नही पाई
क्यों कोखजाई को
मैं विधवा अंतिम विदा नही दे पाई
किस गुनाह की दोषी थी मैं
जो मुझे नही देखने दी गई उसकी गोद भराई
क्या स्त्री होने का दंड है यह
विधुर को क्यों नही होती
इनसब में मनाही
क्यों जवाब न दिया किसी ने
जब - जब मैंने दी दुहाई

अब चिंगारी ने दबाव से जूझकर
ज्वाला का रूप ले लिया है
कष्ट दे दे कर तुमने मेरा ही
मन परिष्कृत कर दिया है
अगर यही तुम्हारा धर्म था
तो मैं अब विधर्मी हूँ
यही थी मर्यादा तो अब यह कलंकित होगी
मैं पीड़ा से खिलकर निखरी हूँ
अब यह परम्परा पीड़ित होगी

Thursday, March 19, 2009

एक सशक्त नारी की कहानी - मैडम मेरी क्युरी


मारिया स्कोलोडोवस्का (मेरी ) का जन्म १८६७ में नवम्बर माह की सातवीं तारीख को वारसा (पोलैंड ) में हुआ था. मारिया के माता पिता अध्यापक थे. जिस वक्त मेरी का जन्म हुआ पोलैंड का राजनीतिक वातावरण काफी अस्थिर था .उनकी माता की असमय मृत्यु के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति भी बहुत बिगड़ गई थी. जन्म से २४ साल की उम्र तक वे अपने जन्म स्थान में रहीं. उन्होंने स्नातक प्रथम श्रेणी में उतीर्ण किया.उस समय वारसा विश्वविद्यालय में महिलाओं का प्रवेश वर्जित था.
आगे की पढाई के लिए उन्होंने पेरिस के सोरबोन विश्वविद्यालय में नामाकन करने का निश्चय किया आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारन यह उनकी पहुँच से बाहर था, इसलिए उन्होंने और उनकी बहन ने निर्णय लिया की उनकी बहन पेरिस में रहकर डाक्टरी की पढाई करेगी और मेरी यहीं घरेलू अध्यापिका का काम करेंगी, जब बहन डाक्टर बन जायेगी मेरी को भी पेरिस बुला लेंगी.

मेरी ने ४ वर्षों तक घरेलू अध्यापिका का काम जारी रखा. इस बीच उन्हें एक परिवार में पढ़ाते हुए उसी परिवार के एक नवयुवक से प्रेम हो गया.एक गरीब अध्यापिका कितनी ही सुन्दर और सुशील क्यों न हो पर एक निहायत ही उच्च वर्गीय परिवार की बहू नहीं बन सकती. इस प्रेम प्रसंग का दुखद अंत हो गया.
अंततः पेरिस से बहन का बुलावा आ गया और मेरी सबकुछ भूल कर एक नए भविष्य को ओर चल दी. नवम्बर १८९१ में वह हजारो मील की रेल यात्रा करके पेरिस पहुँच गई .
वैसे तो मेरी काफी खुले विचारों वाली युवती थी गर्मी की छुट्टिओं में वह खूब आनन्द मनाती दिनों तक बहनों के साथ नृत्य करती पर बहन के पास पेरिस में जीजा की दिल बहलाव चर्चाओं से उसका अध्ययन प्रभावित होना उसे नागवार गुजरने लगा.

उन्होंने इससे बचने के लिए अलग कमरा लेना ठीक समझा.समस्या यह थी की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अच्छा और सुविधाजनक कमरा मिलना नामुमकिन था इसलिए मेरी ने छठवीं मंजिल पर एक कमरा किराये पर ले लिया जो गर्मी में गर्म और सर्दी में बहुत ठंढा हो जाता था.मेरी काम पर जाती,लौटते वक्त फल ,सब्जियां और अंडे लाती ( क्योंकि खाना पकाने का वक्त नहीं बचता था ) फिर तपते गर्म या सिल -ठंढे बिस्तर पर सो जाती.अपनी आत्मकथा में मेरी ने लिखा "यह मेरे जीवन का सबसे कष्टप्रद भाग था, फिर भी मुझे इसमें सच्चा आकर्षण लगता है. इससे मुझमे स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की बहुमूल्य भावनाएं पैदा हुई. एक अनजानी लड़की पेरिस जैसे बड़े शहर में गुम सी हो गई थी, किन्तु अकेलेपन में भी मेरे मन में शांति और संतुष्टि जैसी भावनाएं थी ."

पेरिस में ही उनकी मुलाकात पियरे क्युरी से हुई. पियरे क्युरी वैज्ञानिक कार्य के प्रति पूर्णतया समर्पित वैज्ञानिक थे. वे विवाह की संभावनाओं को लगातार झुठलाते जा रहे थे क्योंकि उनका मानना था "जीवन को जीने के लिए स्त्रियाँ पुरुषों से अधिक प्यार करती है ,परन्तु एक प्रतिभाशाली स्त्री का मिलना दुर्लभ है". पियरे क्युरी को मेरी में यह दुर्लभता दिखाई दी.

इसके बाद क्युरी दम्पति ने एक गोदामनुमा कमरे को प्रयोगशाला का रूप देकर शोध कार्य आरम्भ किया. उन्होंने देखा कि शुद्ध यूरेनियम की जगह यूरेनियम खनिज में अधिक सक्रियता होती है और इससे यह प्रमाणित होता है की मिश्रित यूरेनियम में कोई अज्ञात सक्रिय तत्व है और तत्काल शोध कार्य उस अज्ञात तत्व की तरफ मुड़ गया. अंततः शोधकार्य सफल हुआ और एक नए तत्व की खोज हुई जिसका नाम उन्होंने अपने देश के नाम पर पोलोनियम रख दिया.दूसरी तरह उन्ही के एक सहयोगी ने रेडियम की खोज का दावा किया.इन दावों को मान्यता तब मिलती जब वे इन तत्वों को शुद्ध रूप में प्राप्त करके इनकी भौतिक और रासायनिक गुणों की व्याख्या करते.यह एक कठिन कार्य था खासकर तब, जब उनके पास न तो प्रयोगशाला थी, न ही उपकरण और न ही कच्चे खनिज की पर्याप्त मात्रा. उसपर भी गोदामनुमा प्रयोगशाला में न ही गैस निकासी की व्यवस्था थी न ही सामान्य किस्म के उपकरण ही उपलब्ध थे.वहाँ का वातावरण का दूषित और अस्वास्थ्यकर था. मेरी क्युरी ने इस कठिन समय के बारे में लिखा "इस कष्टप्रद पुराने गोदाम में हमने अपने जीवन के सर्वोतम वर्ष, अपने कार्य को समर्पित करते हुए बिताये. कभी-कभी मुझे मेरी लम्बाई जितनी बड़ी लोहे के छड़ से उबलते हुए पदार्थ को मिलाने में पूरा-पूरा दिन व्यतीत करना पड़ता था. मैं शाम तक थकान से टूट जाती थी .इसके विपरीत काम तब बहुत सूक्ष्म और गंभीर हो जाता जब रेडियम के क्रिस्टलीकरण पर ध्यान केन्द्रित करना पढता था. मैं तब बहुत ही क्षुब्ध हो जाती थी जब दूषित धुँए और धुल से इतनी मेहनत से प्राप्त किये उत्पाद को नहीं बचा पाती थी. इसके बावजूद मैं शोध के उस अबाधित और शांत माहौल में मिले हर्ष को कभी अभिव्यक्त नहीं कर पाऊँगी."
पियरे दम्पति ने शोध कार्य में खुद को इस कदर डुबो दिया की उनका सामाजिक जीवन लगभग खत्म हो गया. १९०३ में मेरी को पीएच . डी की उपाधि मिली. पियरे ने रायल सोसाइटी के समक्ष अपने द्वारा किये गए शोध पर एक व्याख्यान दिया जो बहुत प्रशंसित हुआ. कुछ समय बाद ही क्युरी दंपती को वर्ष की सबसे महत्वपूर्ण खोज के लिए हम्फ्री डेवी पुरुस्कार दिया गया. १९०३ में ही क्युरी दंपती को बेकुरल के साथ भौतिकी के क्षेत्र में नोबल पुरुस्कार मिला. नोबल मिलने के बाद न सिर्फ इनकी आर्थिक स्थिति में सुधर आया वरन काफी लोकप्रियता भी मिली.

प्रसिद्धि के कुछ अँधेरे पहलू भी होते हैं.रेडियो सक्रीय पदार्थों से मुक्त हुई किरने बहुत तीक्ष्न होती है, इनसे जीवित कोशिकाएं नष्ट होने का खतरा होता है. कई बार शरीर पर जलने के घाव बन जातें हैं. अधिक समय रेडियो सक्रीय पदार्थों के बीच रहने के कारन मेरी को रक्त अल्पता और थकान का अनुभव होने लगा और पियरे को भयावह दर्द के दौरे पड़ने लगे. इन विकिरण जनित बिमारिओं के चरम तक पहुचने के पूर्व ही एक दुर्घटना में पियरे का निधन हो गया. तब वे महज ४७ साल के थे. इस दुर्घटना के बाद मेरी टूट गईं. वे शांति चाहती थी परन्तु मिला कोलाहल.

उन्हें पियरे के स्थान पर सोरबोन में प्राध्यापक नियुक्त किया गया.यह पद पहली बार किसी महिला को दिया गया था. मेरी ने कार्य आरम्भ किया जहाँ से पियरे ने छोडा था .मेरी टूट चुकी थी. उनकी जिंदगी के अंधकार का असर उनकी पोशाक के काले रंग के रूप में सबके सामने आने लगा था.
पतझड़ बिता फिर बसंत आया ..और १९१० के बसंत ने मेरी को एक नए प्रेम प्रसंग में डुबो दिया. पाल लैंगविन जो उनका लम्बे समय तक मित्र रह चुका था अब सिर्फ मित्र न रहा. मेरी और लैगोविन ने सोरबोन के पास ही एक मकान किराये पर ले लिया. लैगोविन विवाहित थे और उनके चार बच्चे भी थे . उनकी पत्नी ने इस सम्बन्ध का विरोध किया और हर और इसकी आलोचना होने लगी. कई अवसरों पर मेरी को अज्ञात जगहों पर रहना पड़ा . इस अपमान जनक अभियान को प्रेस और तथाकथित बुद्धिजीविओं का पूरा संरक्षन मिला क्योंकि वे विज्ञानं अकादमी के एक चुनाव में प्रत्याशी थी और वे लोग नहीं चाहते थे की मेरी जीतें. पूरी जिंदगी में मेरी को ईर्ष्या जनित भेदभाव का सामना करना पड़ा क्योंकि वह एक स्त्री थी. अकादमी के चुनाव में उनके प्रतिद्वंदी ने मात्र दो मतों से उनसे विजय हासिल की.
इस बीच १९११ में उन्हें दुबारा नोबल मिला रसायन शास्त्र में उनके योगदान के लिए. नोबल पुरुस्कार समिति के एक अधिकारी स्वानाते अर्रहेनियास ने सुझाव दिया की पुरस्कार को लैगोविन के तलाक के फैसले और मेरी की साफ़ छवि स्थापित हो जाने तक स्थगित कर दिया जाना चाहिए. मेरी ने इसका विरोध किया उन्होंने एक सदस्य को लिखा "यह पुरस्कार मुझे रसायनशास्त्र में मेरे योगदान के लिए दिया जा रहा है, मेरे निजी जीवन से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है. अतः इसे मेरे निजी जीवन के अपयश से यह प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए ".
अंततः फैसला हुआ दिसम्बर १९११ में मेरी ने स्काट होम जाकर यह पुरुस्कार ग्रहण किया.
यद्यपि मेरी का स्वस्थ ठीक नहीं चल रहा था फिर भी मेरी ने द्वितीये विश्वयुद्ध में बेटी आइरीन के साथ चलंत एक्स रे इकाई का गठन किया और और चिकित्सीय कार्यों में अपनी खोज की उपयोगिता दिखाई. उनके निजी

प्रयासों से चलित इकाइयों की संख्या २० और स्थाई की २०० पहुँच गई.
युद्ध के बाद मेरी मेरी ने रेडियन शोध संस्था के अधूरे कार्य को पूरा किया. यह संस्था पियरे को समर्पित थी.
१९१५ आते -आते यह संस्था विश्विख्यात शोध केंद्र बन गई. मेरी खुद ही शोधकर्ताओं का चयन करती थी. मेरी को यात्राओं से नफरत थी बावजूद इसके उन्होंने संस्था के प्रचार के लिए देश -विदेश की यात्रा की. सबसे संस्था

के लिए समर्थन जुटाया. इस कार्य के लिए उन्हें अमिरीकी महिला पत्रकार मेरी मिलोनी का बहुत सहयोग प्राप्त हुआ. मेरी को अमेरिका तक लाने के लिए मिलोनी ने उसे वाईट हाउस में समारोह के दौरान राष्ट्रपति द्वारा दिए

जाने वाले एक ग्राम रेडियम जिसकी कीमत हजारों रुपये थी का प्रलोभन दिया . मेरी ने संस्था के भविष्य को देखते हुए अमेरिका जाने का फैसला किया.उन्होंने राष्ट्रपति से १ ग्राम रेडियम का उपहार ग्रहण किया .
अंततः अस्वास्थ्यता की अवस्था में उनकी मृत्यु १९३४ में हुई और उन्हें पियरे की बगल में दफनाया गया. मेरी ने जिंदगी भर नारी होने की कीमत चुकाई. उनकी प्रतिभा की तुलना उनके व्यक्तिगत जीवन से की जाती रही.


ऐसी ही एक महिला की कहानी मैंने पहले भी लिखी थी जिन्होंने न देखा हो देख लीजिये ..मेरा अनुरोध है
एलिजाबेथ गैरेट , ,