मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 3

पिछली पोस्ट से आगे...
अब जरा एक नजर अवचेतन के इतिहास पर डाले. मनुष्य ने अपनी चेतना बहुत धीमी गति से कठिन प्रक्रिया के उपरांत विकसित की है. एक ऐसी प्रक्रिया जिसमे कई शताब्दियाँ एक सूक्ष्म से परिवर्तन की साक्षी बनी या की बनते -बनते रह गई. आदिम मानव द्वारा तार्किक सचेतन से परे एक अवचेतन की उपस्थिति के प्रमाण लगभग सभ्यता के आरम्भ से ही उपलब्ध हैं, पर इसका दस्तावेजीकरण तब संभव हुआ जब मनुष्य ने लिपि के अविष्कार(about 4000 BC) के बाद अपने अनुभवों को लिपिबद्ध करना आरम्भ किया.

वह सुस्पस्ट वियोजन आदिमानव विश्लेसित कर पाने में असक्षम था. फिर उसे कैसे परिभाषित करता? जाहिर बात है ज्ञात अवधारणाओं को आधार बनाकर, उसकी कसौटी पर. अवचेतन की इस गुत्थी को संक्षेप में नही सुलझाया जा सकता. यहाँ एक प्रसंग को व्याख्यायित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है, जिसे आगे के कई विश्लेसनों में संदर्भित करने की मेरी योजना है.आज के आधुनिक मानव के व्यवहार को परिभाषित करने से पहले हमें उसके वनैले पूर्वजों के व्यवहार को थोडा जानना होगा जिससे की हम उस आदिम मानसिकता को आज के परिवेश में ठीक प्रकार पहचान लें और नियंत्रित कर सके(योजना तो कुछ ऐसी ही है).

मूल विषय पर लौटते हुए ..क्या आपने कभी जानने का प्रयास किया की आपका गोत्र क्या है?
निहायत ही मुर्खता पूर्ण प्रश्न है, विज्ञान (वह भी मनोविज्ञान की आधुनिक शाखा "फंसनल साइकोसिस") के सन्दर्भों में इन वाहियात बातों का क्या तुक? किसी जवाब की अपेक्षा करूँ ? चलिए अपना जवाब फिर कभी दीजिएगा अभी मैं आपकी सोंच को दिशा दे रही हूँ.

आप उरावों अथवा किसी भी आदिम जनजाति के बीच जाइए ..उनसे पूछिए उनका गणचिन्ह क्या है, वे किसी भी जानवर अथवा खाद्य पदार्थ (प्राकृतिक रूप से उपलब्ध - फल सब्जी) का नाम लेकर कहेंगे की यह हमारा टोटेम है..और हम इससे ही जन्मे हैं इसलिए हमें यह खाना निषिद्ध है और क्योंकि इसी चिन्ह से जन्मे दुसरे लोग हमारे भाई/-बहन हैं इसलिए उनसे विवाह की मनाही है. यह एक अन्धविश्वाश है (कैसे प्रचलन में आया इसपर फिर कभी बात होगी ). पुरातन आदिम समूहों में भी यह मान्यता थी( और बड़े जोर शोर से थी) ..माना जाता था किसी का टोटेम अगर भालू है और उसने (अथवा किसी और ने उसके समक्ष) किसी भालू को चोट पहुंचा दी तब उस इन्सान को भी उतनी ही चोट पहुंचेगी और दर्द होगा. कालांतर में जैसे जैसे मूर्तिपूजा का प्रचलन बढ़ा हम देख सकते हैं देवताओं की शक्लों ने इन जानवरों से काफी कुछ अधिग्रहित कर लिया (अभी के आधुनिक देवताओं में भी यह तथ्य देखा/परखा जा सकता है). यह विश्वाश बहुत ही ढृढ़ था. कई बार इसे लेकर खुनी लड़ाइयाँ भी हो जाती. जाहिर बात है ऐसे समाज में जहाँ करने को बहुत कम कार्य हो(सिर्फ शारीरिक जरूरतें हो) जब किसी में विचलन/वियोजन (चेतना का लोप) उत्पन्न होता कह दिया जाता की इसने देवता अथवा टोटेम का अपमान किया होगा(टोटेम के संबध में चोट पहुँचाया पढ़ा जाए).

इससे यह निष्कर्ष निकाला गया की मनुष्य में एक "बुरी आत्मा" (कभी कभी अच्छी और कृपालु भी ) का निवास भी होता है जो मानसिक विचलन/वियोजन के समय प्रकट होती है. इसके प्रभाव सामूहिक रूप से मास हिस्टीरिया(सामूहिक मानसिक वियोजन) के वक्त भी देखे गए हैं जिसपर चर्चा आगे की जाएगी.
आज के लिए इतना ही ..शेष चर्चा फिर कभी ..

पिछली कड़ियाँ ..



मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 1
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 2


- Lovely kumari

मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 2

पिछली पोस्ट से आगे ...
कई बार किसी प्रकार की आवाज गंध या दृश्य भी अवचेतन में प्रतीकों की तरह व्यवहार में आते हैं...जैसे आप कहीं जा रहे हो, किसी खाद्य पदार्थ की गंध आपको वैसी लगी जो बचपन में आपकी माता बनाती थी, तब ..श्रृंखलाबद्ध रूप से आपके अवचेतन में पहले वह खाद्य पदार्थ बनाती माँ का चित्र आएगा फिर उससे जुडी अन्य बातें. प्रतिदिन कई ऐसे सिग्नल हमें अवचेतन से मिलते हैं जिन्हें हमारा सचेतन तार्किकता से अनदेखा करता रहता है..कई बार ऐसा होता है की आपके सचेतन के पास इस अनुभव को विस्तार देने का वक्त नही रहा ..तब आपकी चेतना में स्थान पाने से वंचित वह गंध आपके अवचेतन में संग्रहित हो जाएगी. हो सकता है, रात को आपको सपने में घर दिखाई दे..या फिर बचपन से जुडी कोई याद...उससे संबधित और आपके तात्कालिक कार्य को एक साथ विस्तार देता कोई सपना..अबूझ सा...जिसका विश्लेषण करना संभव न लगे...जो निहायत ही मुर्खता पूर्ण हो (अक्सर ऐसा होता नही है, स्वप्न बहुधा निश्च्तार्थी, सोद्देश्य और साभिप्राय होते हैं यद्यपि अबोधगम्यता तो होती ही है). यह हमारे अवचेतन की कार्य शैली है जिसका अध्ययन फ्रायड के बाद विस्तार से कई मनोवैज्ञानिको ने किया गया. जिससे की इस मत का खंडन हुआ की सपने मात्र हमारी अतृप्त लालसाओं का प्रतिबिम्ब होते हैं.

इसी प्रकार दृश्यों के सन्दर्भ में भी होता है जो कोई दृश्य आप अचानक देखते हैं और आपको लगता है की इस स्थान से मैं पहले गुजर चूका हूँ ..अथवा यह मैंने सपने में या कहीं और (कल्पना में ) देखा है. कई बार अधिक रहस्यप्रिय अज्ञेयवादी मनुष्य इसका विश्लेषण ऐसे भी करते हैं की हो न हो यह मेरे पूर्वजन्म की घटना है, और इसके मंडनार्थ अधकचरे प्रमाण और काल्पनिक कथाएं उपस्थित कि जातीं है.

अब थोडा इस पर ध्यान दें की चेतना में यह "मुक्त संयोजन" (प्रतीकों और बिम्बों का) हुआ कैसे? कैसे विचारों, दृश्यों और परिवेश ने मिलकर एक अलग ही चित्र उपस्थित कर दिया?
मोनालिजा के प्रसिद्द चितेरे लियो नार्दो डा विंची का यह कथन मुक्त संयोजन को समझने में आपकी सहायता करेगा, जो उन्होंने चित्रकारों को संबोधित करते वक्त कहीं लिखा था (जिससे की वे चित्रों में प्रतीकों का उपयोग कर सके, और दर्शक की चेतना उसे कई आयामों में विस्तार दे सके)- It should not be hard for you to stop sometimes and look into the stains of walls or ashes of a fire, or clouds, or a mud or like a place in which you may find really marvellous ideas.




तो आज हमने एक नई अवधारणा से साक्षात्कार किया जिसे मुक्त संयोजन कहते हैं. हमने देखा की कैसे हमारी चेतना में सतर्कता और तार्किकता के कारन उपेक्षा ग्रसित सिग्नल्स मुक्त रूप से संयोजित होते हैं और इन संयोजनों में प्रतीकों की अहम् भूमिका होती है. यह हमारे अवचेतन की कार्यशैली है. शेष चर्चा फिर कभी ...लिखने की जरुरत तो रही नही - "कोई संदेह अथवा जिज्ञासा हो तब अवश्य पूछें"
क्रमशः ...
- Lovely kumari



इस लेखमाला की पिछली कड़ी - मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 1


मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 1

मित्र सिद्धार्थ जोशी जी ने एक पोस्ट लिखी, हमने उसपर अपनी रूचि का विषय जान कर टिप्पणी की पर वह टिप्पणी कहीं गुम हो गई(कह नही सकती तकनिकी खराबी के कारन की कोई और वजह रही). मैंने उनसे अगली सम्बंधित पोस्ट पर टिप्पणी के तथ्यात्मक भाग को देने का आग्रह किया है...फिर भी मुझे लगा इस विषय पर लिखना चाहिए. सिद्धार्थ जी द्वारा उठाये गए विषय (अन्धविश्वाश बनाम छद्मविश्वाश )को मैं उनके ब्लॉग में चर्चा के लिए छोड़ रही हूँ, अनावश्यक दोहराव और तथ्यों के घालमेल से बचने के लिए..यहाँ मेरी पोस्ट/लेखमाला का विषय है "मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव".

बात आरम्भ करने के लिए मुझे उस टिप्पणी के कुछ भाग का उल्लेख करना जरुरी लग रहा है..
आखिर ईश्वर की अवधारणा छद्म विश्वाशी को अथवा अन्धविश्वाशी को कहाँ से मिली जाहिराना बात है पूर्वजों द्वारा संरक्षित थाती से. आगे अगर इस मामले में केरेक्टर आर्कीटाईप और उनके परसोना पर प्रभाव के सापेक्ष इसे विश्लेसित किया जाए तब हम पाते हैं की एक अन्धविश्वाशी भी जीवन में कई बार खुद की इनसे तुलना इनसे करके (परोक्ष/अपरोक्ष) अपना व्यवहार निर्धारित करता है उसी के अनुसार अपने अवचेतन से संचालित होता है, खुद को सही ठहराता है ..और कई मामलों में जुगत भिड़ाता है की उसे कोई इन मामलों में मात न दे पाए. यह पूरी लेखमाला इसी विचार पर आधारित होगी.

ईश्वर की अवधारणा के विकास के मूल में जाने के लिए पिछली पोस्ट देखे. मैं बात उससे आगे बढ़ाती हूँ. हमने देखा की कैसे अंतर्विरोधों से संघर्ष करते हुए मानव सभ्यता का विकास हुआ और वह ईश्वर की अवधारण को कई रूपों में (जैसे चित्रों, गीतों, कहावतों, कहानिओं और लिखित/चित्रित दस्तावेजों द्वारा) अगली पीढी को हस्तान्तरित करता गया.

अब ..इससे आगे बढ़ते हुए ..मनुष्य के व्यवहार में परिवेश को जानने समझाने के क्रम में कई चीजें परोक्ष रूप से अपना प्रभाव अवचेतन पर अमिट रूप से डालती जाती है. वह इन्हें अपनी समझ और मानसिक क्षमता के आधार पर विश्लेसित करता है. हम उन मिथकों और संरक्षित सामग्री के अधिग्रहण स्वरुप उसके व्यक्तित्व पर पड़ते प्रभाव को विश्लेसित करेंगे, पर इससे पहले हमें आगे की लेखमाला में उपयोग होने वाले कुछ शब्दों का मनोविज्ञान में अर्थ समझना होगा. फिर हम विभिन्न सभ्यताओं में बहुतायत पाए जाने वाले काल्पनिक चरित्रों के बारे में जानेंगे/विश्लेषित करेंगे... और इसके बाद हम इसके मानव मन (मस्तिष्क के कार्यात्मक रूप) पर परोक्ष/प्रत्यक्ष प्रभाव देखेंगे.

पहले हम मानव द्वारा निर्मित प्रतीकों के बारे में जानेंगे. इसकी सबसे प्रचलित और सामान्य परिभाषा यह है की - कोई शब्द/शब्द युग्म अथवा चित्र प्रतीक तब कहलाता है, जब वह अपने तात्कालिक/सामान्य/प्रत्यक्ष अर्थ से अलग किसी अन्य वृहद प्रतीकात्मक अथवा संकेतात्मक छवि का निर्माण हमारे अवचेतन में करता है ..उदहारण के लिए हिंदी में इंटरनेट के लिए हम जाल शब्द का उपयोग देखे तब हम पाते हैं की यह सामान्य अर्थो वाले जाल से अलग ढेर सारे संगणकों की अन्तःसम्बद्ध इकाई की छवि हमारे अवचेतन में प्रस्तुत करता है, जो इसके सामान्य अर्थ से सर्वथा भिन्न है. इस प्रक्रिया में मस्तिष्क ने पहले मानव के अवचेतन से जाल की परिभाषा ली फिर संगणकों की उपस्थित से उसे जोड़ कर एक अलग चित्र पाठक की चेतना में प्रस्तुत किया.
क्रमशः ...
- Lovely kumari

आदिमानव और ईश्वर की खोज

जब हम मानव द्वारा संग्रहित ज्ञान और डार्विन के विकासवाद के सापेक्ष मानव के एतिहासिक क्रमविकास को देखते हैं कई बातें उभरती है. किसी अवधारणा के प्रति दुराग्रह मुक्त एक मानव मस्तिष्क ही इन चीजों का आकलन सार्थक रूप से कर पाता है. यह एक निर्विवाद तथ्य है की मानव सभ्यता का विकास प्रकृति के विरुद्ध और उसके द्वारा निर्मित कई प्रकार के डरों के बीच से गुजरते हुए हुआ है, उदहारण के लिए हिंसक पशु, प्राकृतिक आपदाएं, सिमित साधनों का उपभोग करके जीवित रहने के लिए परस्पर प्रतियोगिता ..कई चीजों थी, जिससे मानव जूझता रहा आदिम से आधुनिक बनने के सफ़र में, देखा जाए तो अब भी ये भय चोला बदल-बदल कर अपनी उपस्थिति जताते रहते हैं.

आरम्भ में मनुष्य जब गुफाओं में रहता था आसमान में आलोकित सूर्य से ही उसे उर्जा मिलती. उर्जा के और साधनों की खोज बहुत बाद में हुई. असमान से आते प्रकाश ने उसे यह सोंचने पर विवश किया होगा की ऊपर अवश्य ही कोई है जो उसे दिन में जंगली जानवरों और खूंखार निशाचर जीवों और रात्रि में जानलेवा ठंढ से बचाता है. कहा जा सकता है, इसी भय ने पहले किसी मानसिक संरक्षण और भयमुक्ति प्रदान करने वाली शक्ति की आवश्यकता उत्त्पन की और कालांतर में(भाषा के विकास के साथ)उसे ईश्वर की उपमा से विभूषित किया. इसे हम वर्तमान परिदृश्य में भी देख सकते हैं जहाँ उर्जा के कई प्रतीकात्मक रूपों की आधुनिक समाज में ईश्वर का अंश मान के आराधना की जाती है.

मानव का सभ्यता का विकास प्रकृति की जैविक व्यवस्था के विरुद्ध था. अंतर्विरोधों से संघर्ष करते हुए मनुष्य समाजिकता और सभ्यता की सीढियाँ चढ़ता गया, जटिल होता गया...ईश्वर की अवधारण को कई रूपों में (जैसे चित्रों, गीतों, कहावतों, कहानिओं और लिखित दस्तावेजों द्वारा) अगली पीढी को हस्तान्तरित करता गया..और इसके साथ कई पिढि़ओं से संग्रहित भय (जो उसे अपने बनैले पूर्वजों से विरासत मिला था)भी जटिल होता गया. ईश्वर की अवधारण भी देशकाल समाज के अनुसार बदलती रही...जो आज आपके सामने कई नवीनतम रूपों में उपस्थित है.

आज के लिए इतना ही .. शेष चर्चा फिर कभी. कोई शंका अथवा प्रश्न हो तो अवश्य पूछे.

इसी विषय से संबंधित अन्य प्रविष्टियाँ..
मनुष्य के मष्तिष्क का कार्यात्मक रूप - मन
वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध
स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियाँ और कुछ विचार


अपडेट - अंशुमाली जी की टिप्पणी के बाद मैंने उन्मुक्त जी के पोस्ट का लिंक लगा दिया है, जिसे विकासवाद में रूचि हो वहां पढ़/सुन सकता है.


lovely kumari

अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया

पिछली पोस्ट में द्विवेदी जी और अनूप जी ने मुझसे स्किजोफ्रेनिया पर हिंदी में लिखने का आग्रह किया था.आज अन्धाविश्वाशों में जुड़े इसके आयामों पर चर्चा होगी.
स्किजोफ्रेनिया से ग्रसित लोग ही सबसे ज्यादा अन्धविश्वाशी होते हैं. ये लोग ही सबसे अधिक ओझाओं,पंडितों,तांत्रिकों और मुल्लों की शरण में जाते हैं. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति कल्पनाओं और हकीकत में फर्क करने की क्षमता खो देता हैं.
पहले इसके लक्षणो पर बात करते हैं.

१. सर दर्द अथवा पेट दर्द की शिकायत. जांचने पर कोई कारन अथवा रोग नहीं पाया जाएगा.
२. ये लोग अक्सर अपने पूर्वजों को स्वप्न में देखते हैं.
३. किसी भी अनजान व्यक्ति की चमत्कारिक बातों पर एकदम से भरोषा करते हैं.
४. मृत परिजनों की आवाज सुनना.
५. रोगी बिना कारन के लोगों को शक की दृष्टि से देखने लगता है, दूसरों पर शक करता है की उसने उसपर जादू -टोना कर दिया है. घर पर बिना बताये रोगी तांत्रिकों की शरण में जाता है.
६. अपनी समस्याओं को घर को लोगों से नही बताता.
७. किसी भी कार्य के बीच बुदबुदाता रहता है.
८. लोगों से तुंरत प्रभावित होता है.
९. हर वक्त उदासी घेरे रहती है. हंसने अथवा रोने की स्थिति में असामान्य हो जाते हैं. अगर रोये तब बहुत रोयेंगे, हँसने पर हंसी नही रुकेगी.
१०. खुद को सही समझेंगे और किसी के भी तर्क (अन्धविश्वाश के विरुद्ध ) नही सुनेंगे.
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रोग बढ़ने की दशा में स्थितियां भयंकर हो सकती है. इस विषय में पिछली पोस्ट देखें.
कोई जिज्ञासा अथवा प्रश्न हो तब निसंकोच पूछें. आगे फिर चर्चा की जाएगी.

मनुष्य के मष्तिष्क का कार्यात्मक रूप - मन.

बात पिछली पोस्ट से आगे बढ़ाते हैं. अब हम साइकोसिस रोगों के उस समूह की ओर ध्यान देंगे जो मनुष्य को काल्पनिक छविओं और ध्वनिओं से रूबरू करवाता है, जबकि उसका कोई स्रोत अथवा कारण नही होता. उदहारण के लिए कोई न भी बोल रहा हो तब भी उन्हें आवाजें (कभी - कभी भयानक चीखें भी) सुनाई देती हैं. किसी की भी उपस्थिति न हो तब भी उन्हें काल्पनिक छवियाँ दिखाई देती है. रोग बढ़ने और उपचार न होने की दशा में वे काल्पनिक छविओं और आवाजों के साथ बातचीत भी करने लगते हैं. इस दशा में अगर आपके मन में इश्वर की कृपालु छवि होगी तब वह कृपालु दिखेंगे अन्यथा आपके बुरे कर्मों के लिए आपको श्राप देते हुए. मनुष्य के मष्तिष्क के कार्यात्मक रूप को हम मन की संज्ञा देते हैं. जुंग के अनुसार मनुष्य प्रवृति से धर्मिक होता है, जो मन में ईश्वर है तब वह मनोरोगों में दिखेगा ही.


मनुष्य अपनी चेतना निरंतर हो रहे अनुभवों और स्मृतियों से विकसित करता है. वह अपने समाज और देशकाल में हो रही अथवा हो चुकी घटनाओं से प्रभावित होता रहता है. इन सब के बीच कई बार वह अनिवार्य रूप से समाज द्वारा बनाए गए आदर्श और निकृष्ट व्यक्तित्वों की परिभाषा से अपनी तुलना करता है. यह सब प्रक्रियाएं कहीं परोक्ष रूप से मानव मष्तिष्क में चलती रहती है जिसका भान कुछ को होता है कुछ को नही. मानसिक असंतुलन के समय यह सब चीजें एक साथ सामने आती है. कई बार इनका प्रभाव क्षनिक होता है कई बार बहुत देर तक रहने वाला. यह पुर्णतः इस बात पर निर्भर है की किन कारणों से उस मनुष्य के मानसिक असंतुलन का प्रभाव हुआ है.

इस सन्दर्भ में एक महाशय का उदहारण देना चाहती हूँ. ३५ साल के एक मरीज कुछ दिनों पहले मेरे परिचित मनोचिकित्सक के पास आये उन्हें समस्या थी की उन्हें अनुभव होता था की हर वक्त कोई उनका पीछा कर रहा है उन्हें जान से मार डालेगा. इस कारण उन्होंने अकेले घर से निकालने से इंकार कर दिया. खुद को कमरे में बंद कर बैठे. वे सरकारी सेवक थे. कार्य में निरंतर अनुपस्थिति के कारण उनकी नौकरी खतरे में आ गई गई, तब उनके घर वालों ने उन्हें मनोचिकित्सक के पास ले जाने का फैसला किया.

बातचीत के क्रम में कई बाते सामने आई. उनका बचपन कष्टप्रद बिता था. बचपन में माँ की असामयिक मृत्यु, फिर पिता द्वारा दूसरी शादी, सौतेली माँ द्वारा प्रताड़ना, जैसी कई सारी बाते थी जो उनके मन को निरंतर अवशाद ग्रसित करती गई. उनका जागृत मष्तिष्क इन चीजों को अनदेखा करता गया. पर धीरे धीरे कारणों ने अपना प्रभाव दिखाना आरम्भ किया पहले उन्हें लगाने लगा की सह्कर्मिओं के बीच सारी बाते उनके विरोध में हो रही सब उनकी बुराई कर रहे हैं उन्हें उनके अधिकारी की नजरों में गिरना चाहते हैं. फिर समस्या और विकट हुई. अब उन्हें लगाने लगा सड़क पर चलता हर आदमी उन्हें ध्यान से देख रहा है उनके बारे में बातें कर रहा है. उनके अधिकारी उनकी हत्या करवाने की सोंच रहे हैं, और इन सब की परिणिति उनके द्वारा खुद को कमरे में बंद करके हुई.

चिकित्सा आरम्भ हुई ६ महीने दवा चली. उनका कार्य पर नियमित होना शुरू हुआ और वे सामान्य हो गए इसके बाद उन्होंने दवा बंद कर दी. दवा बंद होने के कई महीनो बाद ये लक्षन फिर प्रकट होने लगे. पर अबकी बार इनका स्वरुप बदला हुआ था उन्हें इस बार ईश्वर दर्शन होने लगे. उनसे बात करने पर उन्होंने बताया की उन्हें ब्रम्हा जी वृद्ध साधू के वेश में आकर प्रवचन देते हैं. जब इनसे मैंने पूछा आप ब्रम्हा से पूछ कर बताइए की उनके मानस पुत्रों की संख्या कितनी है और उनके नाम क्या - क्या है वे बोले मुझे ब्रम्हा ने हिदायत दी है की मैं उनके द्वारा दी गए प्रवचन और ज्ञान को किसी से न बताऊँ. परिजनों ने तंग आकर फिर से चिकित्सा आरम्भ करवाई अब वे स्वस्थ और कार्य में नियमित है पर मनोचिकित्सक को गलियां देते हैं की आपने मुझे ईश्वर दर्शन से वंचित कर दिया है.इन महाशय के केस में स्किजोफ्रेनिया और हैल्यूसिनेशन का प्रभाव रहा.

यह पोस्ट इस लेखमाला की अंतिम पोस्ट है और यह पोस्ट लम्बी भी बहुत हो चुकी है, इसलिए अब अनुमति चाहूंगी. आशा है, ईश्वर दर्शन और मनोरोग में सम्बन्ध आपको भली - भांति समझ आ गया होगा. फिर भी कोई शंका हो तब आपका स्वागत है.
संदर्भित पिछली कडियाँ -
1. वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध.
2. स्त्रियों में मनोरोग और पराशक्तियाँ

वियोजित अनुभव, उनका मानसिक असंतुलन और परा शक्तिओं से सम्बन्ध

मनुष्य मूलतः एक जैविक यन्त्र है, और मष्तिष्क उस यन्त्र का सबसे जटिल भाग. सिर्फ जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम मनुष्य के व्यवहार को परिभाषित नही कर सकते. सामाजिक परिस्थियाँ और परिवेश उसका व्यवहार नियंत्रित करने में अहम् भूमिकाएं निभाते है.

पिछली पोस्ट में हमने मनोरोगों में परा शक्तिओं की उपस्थिति के विभिन्न पहलुओं के बारे में पड़ताल की. अब हम उसके सारे आयामों का अध्ययन एक - एक कर विस्तार से करेंगे.

साइकोसिस संवर्ग के कई वर्तमान रोगियों का व्यवहार भूतकाल में सामान्य होता था (जब तक की स्थितियां उनके मनोनुकूल होती) परन्तु जैसे ही स्थितियां किन्ही कारणों से उनके लिये कष्टप्रद अथवा तनावप्रद हुई, उनके व्यवहार में आश्चर्यजनक बदलाव आने शुरू हुए जो पढ़े-लिखे लोगों में उच्च स्तर की आध्यात्मिकता और अनपढ़ लोगों में परा शक्तिओं से साक्षात्कार में बदल जाता है. इस सन्दर्भ में एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगी मेरी एक परिचित महिला के पुत्र की कुछ साल पहले सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई. वे एक धनी परिवार की संतुष्ट महिला थीं. बच्चे की मृत्यु के पंद्रह दिनों तक वे खुद रोती-बिलखती रहीं. फिर एक सुबह उठी और आश्चर्यजनक रूप से उनका व्यवहार बदल चुका था. उन्होंने बताया की रात को उनके कमरे में प्रकाश फ़ैल गया भगवान जी प्रगट हुए और उन्होंने बताया की तुम्हारा पुत्र जीवित है. सारे लोग जो तुम्हारे आस- पास हैं अज्ञानी हैं.

इस घटना के बाद उन्होंने अपना काल्पनिक संसार बना लिया वे अपने बच्चे के कपडे धोतीं, उसके लिए खाना बनाती, उसके स्कूल फीस जमा करने जाती और किसी के समझाने पर भी यह स्वीकार नही करती कि उनका पुत्र मर चुका है. उनका कहना था की "तुम पर क्यों विश्वास करूँ जब मुझे भगवान ने खुद प्रगट होकर कहा है की तुम सब अज्ञानी हो".

परिजनों को चिंता हुई उन्होंने महिला का इलाज मनोचिकित्सक से करवाने की ठानी. इलाज आरम्भ हुआ. अब स्थितियों में काफी सुधार है पर दवाई रुकते ही देवी जी को भगवान दिखने लगते हैं.

अब इसके कारणों की जाँच की जाये. हमारा मष्तिष्क एक ही समय में कई अनुभवों, संवेदनाओं और स्मृतियों से जूझता रहता है. जो प्रत्यक्ष रूप से कार्य में आने वाले नहीं होते वह उन्हें मूल चेतना से वियोजित करके अवचेतन मष्तिष्क में डाल देता है. मानसिक असंतुलन की स्थिति में यही वियोजन व्यवहार में प्रकट होता है जिसे सामान्य लोग परिभाषित नही कर पाते और अचंभित/चमत्कृत होते हैं.

बाकि आयामों पर चर्चा जारी रहेगी. आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं का स्वागत है.

स्त्रियों में मनोरोग पराशक्तियाँ और कुछ विचार

आपने कभी किसी पर भूत -प्रेत, जिन्न या देवता आते देखा है? अगर आपका जरा भी सरोकार ग्रामीण भारत से रहा हो तब जरुर ऐसे दृश्य आपकी आँखों के सामने से गुजरे होंगे की एक महिला को कुछ लोगों ने थाम रखा है और वह खुद को कोई देवी, पुण्यात्मा अथवा प्रेतात्मा बता रही है, कानाफूसी हो रही है, लोग पराशक्ति के इस चमत्कार पर नतमस्तक हो रहे हैं. उतर - पूर्व भारत में तो पराशक्तियों से छुटकारा पाने के लिए बाकायदा मेले लगाये जाते हैं जिसमे ऐसे दृश्य आम होते हैं. आश्चर्य की बात यह है की ऐसे लोग अधिकतर समाज के उस तबके से आते हैं जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नही होती. अनजानी रोग -व्याधियों के भय के साथ अशिक्षा और अज्ञान की दोहरी मार ही वह कारन है जिसकी परिणिति इन दृश्यों के रूप में होती है.

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो मनुष्य का व्यहवार मस्तिष्क के अन्दर होने वाली जैव रासायनिक प्रक्रिया द्वारा नियंत्रित होता है. मस्तिष्क अगर किसी बाह्य अथवा आंतरिक कारण जैसे मिर्गी, ब्रेन ट्यूमर, तनाव, नशीले पदर्थों का सेवन, अत्यधिक थकान भूख या कमजोरी के कारण उतेजित हो जाए तब मनुष्य को काल्पनिक छवियों, स्पर्स अथवा ध्वनि का साक्षात्कार होने लगता है. इस दशा में यह साक्षात्कार बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है की आपकी सामाजिक संस्कृति -परम्परा में ईश्वर का क्या रूप है. यहाँ ध्यातव्य हो की सभी धर्मो में उपवास को अनिवार्य घोषित किया गया है अतः यह संदेह होना की यह प्रक्रिया धार्मिक पाखंडियों द्वारा समाज को धार्मिक बनाये रखने की दिशा में कुटिल प्रयास है, बहुत अस्वाभाविक नही है.

अब सवाल यह है की स्त्रियाँ ही इन रोगों से अधिक क्यों ग्रसित होती है ?
कारण जानने के लिए हमे अपनी सामाजिक व्यवस्था की जड़ों की तरफ जाना होगा. स्त्रियों की दशा भारतीय ग्रामीण समाज में बहुत दयनीय है. बाल-विवाह, बहु पत्नी प्रथा, कुपोषण और इसके कारण रोगों में वृद्धि, तथा पारिवारिक एवं सामाजिक मामलों में स्त्रिओं की उपेक्षा आदि बहुत से कारण हैं जो स्त्री के अवचेतन मन -मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालते हैं. आज भी ग्रामीण भारत में जब तक स्त्री दैवी शक्तिओं से लैस नही हो जाती भोग्या ही रहती है. देव कृपा से लैस होने के बाद अचानक उसे आदर -सम्मान के भाव से देखा जाने लगता है, उसकी तरफ आँख उठा कर देखने का साहस वे लोग खो देते हैं जो कल तक उसे भोग्या समझते थे, जिसका उसके अवचेतन पर प्रभाव पड़ता है. मैंने एक गैर सरकारी संगठन के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता फैलाने के अभियान के दौरान कई ऐसे मामलों को देखा. मैंने पाया की धर्म और इश्वर की शक्ति को पीड़ित लोग अस्त्र की तरह इस्तेमाल करते हैं. मनोचिकित्सकीय परीक्षन के दौरान ऐसी स्त्रियाँ जब अपने मन के कपाट खोलती हैं तो आभावों और अत्याचारों से पीड़ित मन के कंपा देने वाले संस्मरण निकलते हैं.

अब प्रश्न है की वे सारे लोग जिन्होंने परा शक्तियों से साक्षात्कार का दावा किया है क्या मानसिक अथवा साइकोसिस संवर्ग के रोगी हैं ?
हम इसके दुसरे पहलु पर ध्यान केन्द्रित करते हैं. इसका एक आर्थिक पहलू भी है. इश्वर का साक्षात्कार करने वाले बाबाओं और ओझा -गुणिओं की बात करे तब हम पाते हैं इन्होने अपनी बोली-वाणी, रहन -सहन और व्यहवार ऐसा बना लिया है की कोई भी आसानी से इनपर विश्वास कर ले. ये लोग पुर्व निर्धारित योजनाओं के तहत दावे करते हैं और बड़े ही शांत और सुनियोजित ढंग से इसे रोजगार का रूप देते हैं .इन्हें पता होता है की ये झूठ बोल रहें हैं परन्तु रटे -रटाये वाक्य और धार्मिक -आध्यात्मिक कुतर्कों की बदौलत ये अपनी झोलियाँ आराम से भरकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं. जरुरत है मन-मष्तिष्क को पूर्वाग्रहों से मुक्त करने की ..यह मुश्किल है पर नामुमकिन नही.

ऐसा नहीं है कि कुछ लोगों के पास इछाशक्ति होती है और कुछ के पास नहीं. सच यह है कि कुछ लोग बदलने के लिए तैयार रहते हैं और कुछ नहीं.

अपडेट - इस सन्दर्भ में द्विवेदी जी और अरविन्द जी की इन पोस्टों के अवश्य पढ़े पुरजोर सिफारिस है.

जब वैद्य मामा से औरत पर चढ़ने वाला भूत डरने लगा
उसे साँप ने नहीं काटा था..

He who rejects change is the architect of decay. The only human institution which rejects progress is the cemetery.

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