अन्धविश्वाशी लोगों में पाया जाने वाला सामान्य रोग - स्किजोफ्रेनिया

पिछली पोस्ट में द्विवेदी जी और अनूप जी ने मुझसे स्किजोफ्रेनिया पर हिंदी में लिखने का आग्रह किया था.आज अन्धाविश्वाशों में जुड़े इसके आयामों पर चर्चा होगी.
स्किजोफ्रेनिया से ग्रसित लोग ही सबसे ज्यादा अन्धविश्वाशी होते हैं. ये लोग ही सबसे अधिक ओझाओं,पंडितों,तांत्रिकों और मुल्लों की शरण में जाते हैं. इस रोग से ग्रसित व्यक्ति कल्पनाओं और हकीकत में फर्क करने की क्षमता खो देता हैं.
पहले इसके लक्षणो पर बात करते हैं.

१. सर दर्द अथवा पेट दर्द की शिकायत. जांचने पर कोई कारन अथवा रोग नहीं पाया जाएगा.
२. ये लोग अक्सर अपने पूर्वजों को स्वप्न में देखते हैं.
३. किसी भी अनजान व्यक्ति की चमत्कारिक बातों पर एकदम से भरोषा करते हैं.
४. मृत परिजनों की आवाज सुनना.
५. रोगी बिना कारन के लोगों को शक की दृष्टि से देखने लगता है, दूसरों पर शक करता है की उसने उसपर जादू -टोना कर दिया है. घर पर बिना बताये रोगी तांत्रिकों की शरण में जाता है.
६. अपनी समस्याओं को घर को लोगों से नही बताता.
७. किसी भी कार्य के बीच बुदबुदाता रहता है.
८. लोगों से तुंरत प्रभावित होता है.
९. हर वक्त उदासी घेरे रहती है. हंसने अथवा रोने की स्थिति में असामान्य हो जाते हैं. अगर रोये तब बहुत रोयेंगे, हँसने पर हंसी नही रुकेगी.
१०. खुद को सही समझेंगे और किसी के भी तर्क (अन्धविश्वाश के विरुद्ध ) नही सुनेंगे.
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रोग बढ़ने की दशा में स्थितियां भयंकर हो सकती है. इस विषय में पिछली पोस्ट देखें.
कोई जिज्ञासा अथवा प्रश्न हो तब निसंकोच पूछें. आगे फिर चर्चा की जाएगी.

31 comments:

Arvind Mishra October 30, 2009 11:19 PM  

अच्छी जानकारी -अब पता चला की कुछ ब्लागर भी इसी बीमारी के शिकार हैं -क्योकि लक्षण हूबहू मिल रहे हैं !

आभा October 30, 2009 11:21 PM  

लवली आप का पिछला आलेख भी पढ़ी . बहुत ही महत्वपूर्ण बातें और लिखो .

ललित शर्मा October 30, 2009 11:24 PM  

@ लवली जी आपने ज्ञान वर्धक जानकारी दी है, लेकिन इसे गांव के लोगो को समझाना एवं प्रत्यक्ष उदाहरण देकर समझाना बहुत ही कठिन काम है, मैने बड़े-बड़े आइ ए एस ,आई पी एस अधिकारियों को देखा है(जिन्हे लोग सबसे पढा लिखा समझते हैं)इन अंधविस्वासों मे पडे हुए,
हमने भी चोट खाई-तभी अकल आई-एक दो दिन मे ललित डाट काम पर पढिए-आप बीती-स्वागत है।

Apoorv October 30, 2009 11:47 PM  

इस बीमारी पर व्यापक जानकारी जनमानस के लिये बहुत जरूरी है..वर्ना तो बस मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की!!..हाँ और अचानक शा्रीरिक शक्ति की वृद्धि का कारण क्या..और भी जानकारी अपेक्षित रहेगी इस बीमारी के बारे मे..आभार!!

sanjaygrover October 31, 2009 1:08 AM  

अच्छी जानकारी दी आपने। वैसे तो हर मानसिक रोगी सहानुभूति के योग्य है पर मुश्किल यह है कि संख्या में अधिक होने और इसी के चलते आत्मविश्वास जैसा कुछ अर्जित कर लेने के कारण ये दूसरों को ही पागल करार दे देते हैं। चेखव ने वार्ड न. सिक्स में और मंटो ने टोबा टेकसिंह में इस विडम्बना को बख़ूबी चित्रित किया है। एक ग़ज़ल मुझसे भी हो गयी थी। एक शेर:-

पागलों की इस कदर कुछ बदगुमानी बढ़ गयी-
उनके हिस्से की दवा भी हमको खानी पड़ गयी।

महफूज़ अली October 31, 2009 12:10 AM  

bahut achchi lagi yeh jaankari..... aajkal yeh common bimaari ho gayi hai.... har tabke mein.....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi October 31, 2009 12:16 AM  

आप के बताए लक्षणों ने इस की पुष्टि कर दी। वैसे इस के अनेक रोगी संपर्क में आए हैं। अंधविश्वास की चिकित्सा ही इस रोग की भी चिकित्सा होनी चाहिए।

shaishav October 31, 2009 1:59 AM  

यदि इस बीमारी का सम्बन्ध अन्ध विश्वास से है तब तो यह निष्कर्ष निकालना गलत न होगा कि पढ़े लिखे भी अन्ध विश्वासी होते हैं । प्रतीक्षा रहेगी ,अगली कड़ियों की।

अभिषेक ओझा October 31, 2009 2:38 AM  

ये लक्षण 'केवल' स्किजोफ्रेनिया से ही आते हैं या कोई और भी कारन होता है. क्योंकि फिर तो स्किजोफ्रेनिया के मरीज भरे पड़े हैं.

बी एस पाबला October 31, 2009 3:12 AM  

अच्छे अच्छों को इस बीमारी से ग्रस्त देखा जा सकता है।
टोबा टेक सिंह की खूब याद दिलाई संजय जी ने

बी एस पाबला

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey October 31, 2009 6:23 AM  

यह संजय ग्रोवर की टिप्पणी बहुत दमदार है!

M VERMA October 31, 2009 1:41 AM  

अच्छी जानकारी दी आपने. अन्धविश्वास तो अपने आप मे सबसे भयानक बीमारी है

अनूप शुक्ल October 31, 2009 8:50 AM  

सही है। सच में मुझे इसके बारे में मालूम नहीं था कि इस बीमारी के लक्षण क्या-क्या होते हैं। अंग्रेजी में पढ़कर समझने का मन नहीं किया। अब तुमने समझा दिया अच्छी तरह। समझ गये। शुक्रिया। कुछ भ्रम भी थे इस बीमारी के बारें वो भी दूर हुये।

सागर नाहर October 31, 2009 8:51 AM  

हमेशा की तरह ज्ञानवर्धक पोस्ट ।

शरद कोकास October 31, 2009 4:52 PM  

सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस रोग के रोगी यह स्वीकार ही नहीं करते कि उन्हे यह रोग है ।

समय October 31, 2009 1:29 PM  

ज़्यादा जानकारी नहीं है फिर भी समय अपनी आदत से लाचार है। कुछ तो कहेगा ही।

चिकित्सा शास्त्रियों की मज़बूरी होती है कि वे प्रत्येक संदर्भित शारीरिक और मानसिक स्थिति विशेष के लिए एक शाब्दिक संकल्पना का प्रयोग करें ताकि सार्विक रूप से इसका विश्लेषण, निदान और संभावित ईलाजों पर अन्वेषण कर सकें।

इसी के तहत वे शायद इन्हें कोई नाम-विशेष प्रदान कर देते हैं, फिर यह अवस्था विशेष, एक रोग के रूप में सार्विक हो उठती है।

शारीरिक मामलों में तो फिर भी ठीक-ठाक रहता है, पर मानसिक अवस्थाओं के लिए किया गया यह वर्गीकरण कई बार असल मंतव्यों को पृष्ठभूमि में कर देता है।

इन मानसिक अवस्थाओं को भी जीवाणु या रोगाणु जनित रोगों की भांति ही ट्रीट किए जाने की सामान्य मनसिकता का प्रचलन, चिकित्सकों और मानसिक विकास बाधित व्यक्तियों में होने लगता है।

ऐसे व्यक्ति अपने परिवेशगत प्राप्त मानसिक अनुकूलन में होते हैं। यह मानसिक अपरिपक्वता, वर्तमान जीवन की क्लिष्ट परिस्थितियों और उनकी मानसिक अवस्थाओं के सापेक्ष अधिक विकसित क्रूर वास्तविकताओं के साथ सामंजस्य नहीं बिठा पाती और यहां संदर्भित ऐसे ही संकल्पित मानसिक रोगों के लक्षणों के रूप में अभिव्यक्त होती है।

जाहिर है यहां वास्तविक जरूरत, मानसिक अनुकूलन के उन्नयन और कठोर जीवन वास्तविकताओं के सापेक्ष परिपक्वता के विकास की थोड़ी लंबी प्रक्रिया की होती है।

परंतु जैसा कि यहां पहले भी कहा गया था, होता यह है कि घोषित रोगी और घोषणा करने वाला चिकित्सक दोनों ही इन मानसिक अवस्थाओं के इसी शाब्दिक निदान और उपलब्ध दवाओं में अपनी तात्कालिक संतुष्टि पा लेते हैं और मानसिक उन्नयन की थोड़ी लंबी प्रक्रिया से मुक्ति पा लेते हैं या इसे स्थगित कर देते हैं।

अब यह बात अलग है कि जब परिस्थितियां ज़्यादा गंभीर हो जाती हैं, तो इन तात्कालिक उपायों का प्रयोग जिनमें कि ज़्यादातर मस्तिष्क की प्रक्रियाओं को सुन्न करना शामिल होता है, वाज़िब हो उठता है।

००००००००००००००००००

ब्लॉगजगत की ऐसी हस्तियों पर भी दोनों तरह के प्रयोग होते रहने ही चाहिएं। यानि कि कभी सुन्न करने का इंजेक्शन और कभी मानसिक परिपक्वता के उन्नयन के जतन।

ठीक है ना।

शुक्रिया।

अजित वडनेरकर November 1, 2009 1:38 AM  

काव्यशास्त्रीय नज़रिये से विचार करें तो हर तरह की कला मनोविकारों से जन्म लेती है। ब्लागर्स में भी अगर स्किजोफ्रेनिया के लक्षण दिख रहे हैं तो आश्चर्य क्या है?

लवली कुमारी / Lovely kumari November 1, 2009 6:03 AM  

@अजित जी - समस्या तब तक नही होती जब तक आप खुद या किसी और के लिए खतरा नही बनते. अक्सर देखा गया है मनोरोगों से पीड़ित व्यक्ति को बहला फुसला कर उनका गलत फाईदा उठाया जाता है. मेरा मंतव्य ऐसे लोगों को सावधान करना भर है, शेष कला और मनोरोगों के सम्बन्ध पर चर्चा कभी आगे होगी. इस बिंदु पर ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi November 1, 2009 11:43 AM  

लवली जी

चाहे कोई भी कारण रहे हों मैं स्किजोफ्रीनिया रोग को इतना करीब से जानता हूं जितना कि मरीज खुद जानते हैं। यकीन मानिए कि चिकित्‍सक भी नहीं जानते कि भेड़ की खाल में किस तरह का भेडि़या है। और आपने जिस चवन्‍नी छाप स्‍टाइल में इसका विश्‍लेषण किया है इससे तो इस रोग के आगामी विश्‍लेषणों पर और भी समस्‍या पैदा होगी। अच्‍छा होगा कि नेट पर मौजूद स्किजोफ्रीनिया की जानकारी को थोड़ा गंभीरता से पढि़ए। आपकी समझ में आएगा कि वास्‍तव में यह रोग क्‍या है। इसे अंधविश्‍वास या किसी और चालू टाइप की मानसिक अवस्‍थाओं से जोड़ने से आपकी पोस्‍ट तो पूरी हो गई लेकिन हकीकत कोसों दूर रह गई।


भले ही मेरी बात आपको तल्‍ख लगे लेकिन आपकी यहां स्थिति अधजल गगरी छलकत जाए वाली है। अभी आपने रोग को पढ़ा भी नहीं है और लिखना शुरू कर दिया। मेरी गुजारिश है कि इसके बारे में दोबारा पढ़ें और फिर निष्‍कर्ष निकालें। हो सके तो अपनी इस पोस्‍ट के लिए अपने लेखकों से माफी भी मांगें।

इतना सब इसलिए लिखा क्‍योंकि मैं आपको गंभीर ब्‍लॉगर मानता हूं।

इति...

sanjaygrover November 1, 2009 10:36 PM  

एक और बहुत महत्वपूर्ण बात कहने से नहीं रोक पा रहा हूं खुदको। मेरे ख्याल से हमें कलाकारों, ईमानदारों और सामान्य लोगों के मनोरोगों में फर्क करना आना चाहिए। मसलन अगर एक ईमानदार आदमी अगर यह शक करता है कि दफ्तर के बाकी लोग उसके खिलाफ साजिश में लगे रहते हैं तो ज़्यादा संभावना यही है कि उसके शक सच्चे हों। इसी तरह एक कलाकार या लेखक के संदेह भी सही हो सकते हैं क्यों कि उनकी दुनिया भी विचारधाराओं और गुटों में बंटी होती है। और कई गुट या धाराएं अपने से भिन्न विचारों, धाराओं, धर्मों, पंथों को मिटाने या हटाने में किसी भी तरह के उपाय आज़माने में परहेज़ नहीं करते। तहलका. काम के उदाहरण में हमने देखा था किस तरह उन्हें एक बार तो लगभग खत्म ही कर दिया गया था। हमारे पास उदयप्रकाश जैसे जीनियस लेखक हैं। मुझे याद है कि ‘हंस’ में ’आत्मतर्पण’ नामक स्तम्भ में सबसे पहले खुद उन्होंने अपनी मानसिक बीमारियों का ज़िक्र किया था। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि उनके लेखन का अधिकांश, यथास्थितिवाद और प्रभुवर्ग के मठों/माफ़ियाओं के खिलाफ होता है। यहां पर हमें ईमानदारी से जांचना चाहिए कि इस संदेह में कितना उस व्यक्ति का वहम है और कितनी सच्चाई। और जांचने की यह ईमानदारी हममें तभी आ सकती है जब हम खुद इस तरह के भेदभाव/ऊंच-नीच की मानसिकता से ऊपर उठ चुके हों। उक्त उदाहरणों का अंधविश्वासी, ज्योतिषशास्त्री और आर्यसमाजी विचारधारा का सहारा लेकर हर कर्मकांड को ‘वैज्ञानिक’ ठहराने की कोशिश करने वाले ब्लागरों के साथ सामान्यीकरण करना निहायत ही खतरनाक है।

vinay November 1, 2009 4:09 AM  

सहमत हूँ ललित जी से,और उन लोगों से असहमत हूँ,जो कहते हैं,बहुत से बलोगर के बारे में लिखा गया है,वह स्किजोफ्रनिया से ग्रसित लगते हैं,बिना तथ्यों की खोज किये या वह बलोगर जिनको स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित बताया गया है,उन से साक्शातर किये बिना कैसे केवल कल्पना के आधार पर कहा जा सकता है,वोह स्किजोफ्रेनिया से पीड़ित लगते है?
इस प्रकार की टिप्पणी करने से बचता हूँ,और किसी के दिल को ठेस पहुँची हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ,मुझे विवश हो कर यह टिप्पणी करनी पड़ी,यह किसी की भी भावना को आहत करने वाली वात है,और यह वात में सर्वजनहिताय के लिये कह रहा हूँ,परोक्ष में,इस प्रकार की बात किसी के अवचेतन मन में घर कर सकती है,और उस को यह मनोरोगी बना सकती है,और उसको काउनसिलिंग की सहायता लेनी पड़ सकती है,और यह बात किसी मानसिक रूप से स्वस्थ इन्सान को ओझा या तान्त्रिक के चगुंल में फसा सकती है,यह बहुत ही सवेंदन शील बात है । मेरी बात को अन्यथा ना लें,धन्यवाद ।

लवली कुमारी / Lovely kumari November 2, 2009 12:27 AM  

@सिद्धार्थ जी-
सर्वप्रथम तो आप तशरीफ़ लाये और मुझे अपने विचारों से अवगत करवाया इसके लिए आपका बहुत धन्यवाद.
आगे..
इसे अंधविश्‍वास या किसी और चालू टाइप की मानसिक अवस्‍थाओं से जोड़ने से आपकी पोस्‍ट तो पूरी हो गई लेकिन हकीकत कोसों दूर रह गई - मेरा उद्धेश्य स्किजोफ्रेनिया रोग (एक प्रकार की मानसिक अवस्था)के अन्धविश्वाश से जुड़े होने के प्रमाण देना था न की उसके अन्य पहलुओं पर चर्चा करना, यह आपको मेरे द्वारा दी गए पोस्ट के शीर्षक से स्पस्ट होगा. जैसा की आप जानते होंगे मनोरोगों के वर्गीकरण की वर्तमान प्रणाली में लक्षणों के विवरण मात्र को ही रोग के पहचान का आधार बनाया जाता है, और उसके कारणों को विश्लेषण की सीमा से अलग रखा जाता है. यह लक्ष्न परिवेश गत परिवर्तन के साथ मनुष्य में उपस्थित होते हैं, जैसा की मित्र समय की टिप्पणी से स्पस्ट है.
कई महान लोगों (उनमे समाज के लिए कोई दुर्भाव नही होता) में भी ऐसी मानसिक अवस्थाओं के संकेत मिले हैं, तब आप किन लक्षनो की और संकेत कर रहे हैं जरा स्पस्ट करें?
इस पोस्ट में मैंने कहीं यह नही लिखा की के बस इतने लक्षन होते हैं यह अन्धविश्वाश वाले पहलू की ओर संकेत भर था. वैसे भी आप जानते ही होंगे की जिन व्यक्तियों में सजस्टीबिलटी ज्यादा होती है वही तंत्र विद्या/चमत्कारिक घटनाओं में ज्यादा विश्वास करते हैं.
तब आगे आपके उत्तर की प्रतिक्षा रहेगी ..और चलते - चलते यह भी बता दूँ (प्रसंगवश) की मैंने अपनी जिंदगी के २० साल एक स्किजोफ्रेनिया के रोगी के साथ बिताए हैं. नाम लेना मैं जरुरी नही समझती.

- लवली

लवली कुमारी / Lovely kumari November 2, 2009 12:32 AM  

@संजय जी - इस विषय में मैं कह चुकी हूँ, इसपर आगे चर्चा होगी.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi November 2, 2009 10:15 AM  

लवली कुमारी जी यह वजनदार पहलु है कि आपने स्किजोफ्रीनिया के रोगी के साथ बीस साल बिताए हैं लेकिन आपकी मूल पोस्‍ट में अब भी वास्‍तविकता कोसों दूर है, हालांकि नीचे कमेंट में आप अपनी बात स्‍पष्‍ट कर रही हैं लेकिन दोनों मिलकर आत्‍मव्‍याघात पैदा कर रहे हैं। हो सके तो दोबारा पढि़ए।

इस विषय पर एक पोस्‍ट मैं अपने दिमाग की हलचल पर डालूंगा। समय मिले तो देखिएगा।

लवली कुमारी / Lovely kumari November 2, 2009 8:32 PM  

@@सिद्धार्थ जी-
मेरी मूल पोस्ट में जो लक्षन आपको गलत लग रहा है कृपया उसका उल्लेख करें.
यह पोस्ट झारखण्ड के एक मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के पुर्व एच ओ डी से बातचीत के बाद लिखी गई है.
..शेष मैंने इसे मन की एक निश्चित दशा /अवस्था से जोड़ कर लिखा है.
कृपया पुर्व लिंकित लेख पढ़े.

vinay November 3, 2009 5:40 AM  

लबली जी अपने लेख इम्पलसिव व्यवहार का आपको लिंक दे दिया है ।

हिमांशु । Himanshu November 5, 2009 4:05 AM  

प्रविष्टि टिप्पणियों के साथ पूरा पढ़ गया । बहुत से लक्षणों को तो मैं किसी रोग के लक्षण ही नहीं समझता था ।

प्रविष्टि का आभार ।

Rajey Sha November 9, 2009 1:44 AM  

आदरणीय लवली जी,
आपकी पोस्ट में निम्नलिखित बिन्दुओं में वर्तनी त्रुटियाँ हैं:
1. सददर्द - सिरदर्द, कारन - कारण
3. भरोषा - भरोसा
5. कारन - कारण
वैसे बिन्दु क्रमांक 10 के अनुसार देखें तो कौन है जो सिक्जोफ्रेनिया ग्रस्त नहीं है?

लवली कुमारी / Lovely kumari November 9, 2009 5:49 AM  

@Rajey Sha जी - वर्तनी में गलतियाँ बताने का शुक्रिया ..फोंटिक कन्वर्टर में टाईप करने के कारन यह गलतियाँ रह जाती है ..और वक्त की कमी के कारन मैं सुधार नही पाती.
आगे ..
किसी भी एक लक्षन के आधार पर किसी की मानसिक दशा का निर्धारण नही किया जा सकता .. यहाँ मैंने सिर्फ परा शक्तिओं के अस्तित्व को महसूस करने वाले लोगों की सामान्य मनोदशा का खाका खिंचा है. यह लक्षन देशकाल और परिवेश के हिसाब से पुर्णतः बदल सकते हैं.
शेष सिर्फ किसी को कुछ हफ्तों से खांसी है इसके आधार पर उसे टी बी का मरीज नही बताया जा सकता..पर कोई तो समस्या होगी अगर कोई किसी मानसिक आवेग को नियंत्रित करने में असक्षम हो रहा है...है न ?

कुन्नू सिंह November 10, 2009 12:55 PM  

बढीया जानकारी, ईसका ईलाज क्या है?

लवली कुमारी / Lovely kumari November 10, 2009 8:03 PM  

@कुन्नू सिंह - इसका निदान मनोचिकित्सक बता पाएँगे ..कई मामलों में काउंसलिंग और रोग बढ़ने की दशा में दवाइयां जो मस्तिष्क की अतिक्रियाशिलाता के मार्ग में बाधा बने.

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