मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 4

पिछली पोस्ट से आगे...
पिछली शताब्दी के आरम्भ में फ्रायड और josef breuer ने बताया की विशेष परिस्थितिओं में किसी प्रकार का असामान्य व्यवहार अकारण नही होता बल्कि अर्थपूर्ण होता है. यही वह तरीका है जिससे प्रतीकात्मक रूप से हमारा अवचेतन खुद को अभिव्यक्त करता है. उदाहरण के लिए एक इन्सान जिसका सामना ऐसी परिस्थितिओं से हो रहा है जो उसके लिए असह्य है, और उसके अवचेतन से इसे न पचा पाने के सिग्नल्स मिल रहे हैं...तब इसकी परिणिति तंत्रिका के उद्दीपन से उत्पन्न संकुचन के रूप में हो सकती है. इसके कई उदाहरण हमें सामान्य जीवन में देखने को मिलते हैं जैसे की तनाव की स्थिति में अस्थमा के दौरे, शरीर में दर्द के प्रति कोई प्रतिक्रिया न होना, झंझनाहट, संज्ञा शून्यता, उल्टियाँ आना(कई लोगों को भीड़ से असहजता होती है). वस्तुतः ऐसी परिस्थितिओं में आप अनायास ही अपने अवचेतन द्वारा निर्देशित होते हैं. कई मामलों में देखा गया है जैसे - जैसे आपमें बुद्धि और सहनशीलता बढ़ती है आप इन चीजों से मुक्त हो जाते हैं.

एक उदहारण लेते हैं - आपको कहीं बाहर जाना जाना है आप स्टेसन के लिए निकलते हैं..घर के सारे खिड़की/दरवाजे, गैस का बर्नर, नल की टोटियां, लाईट, पंखे वैगेरह चेक करते -करते निर्धारित समय से कुछ देर हो जाती है..आप आपाधापी में स्टेसन पहुंचाते हैं. परिसर में पहुंचकर चैन की साँस लेते हुए घडी देखते हैं..सामान रखकर बैठते हैं और १०-१५ मिनट बाद याद आता है की तमाम सावधानिओं के बाद आप टिकट घर पर भूल आयें हैं..यह कैसे हुआ? इसका जवाब खोजा जाए..तब हम पातें हैं की हमारा ध्यान "समय पर स्टेसन पहुंचना है" पर लगा हुआ था, जिसके कारण हमारी चेतना के आलोक से वह भाग अनछुवा रह गया जिसमे किसी अन्य सावधानी की आवश्यकता थी.

अब इसका एक और पहलू देखें जो भूली हुई यादों को आपके वर्तमान से सबद्ध करता है. इस सामान्य भुलाने की प्रक्रिया को एक तरफ करके हम फ्रायड के उस मत पर ध्यान देते हैं जिसके अनुसार भूतकाल की भूली हुई बातें/अनुभव आपके अवचेतन के निर्माण के लिए उत्तरदाई होते हैं. ऐसा क्यों होता है की कई बार हमें वह सुगंध भली सी लगाती है जो कभी बचपन में हमारे अभिभावकों द्वारा इस्तेमाल की जाती थी? ...दरअसल हम अबोध होते हुए भी उस सुगंध को अपने अवचेतन में संग्रहित किये कई सालों से घूम रहे होते हैं. एक संगीतकार का अपने बचपन में सुनी किसी धुन से प्रेरित होकर उसके समान धुन बनाना आदि उदाहरण भी इसी श्रेणी में आते हैं. इसी प्रकार आपके भावनात्मक विचलनों (जैसे क्रोध, भय, असुरक्षाबोध आदि ) में आपके व्यक्तित्व का जो गुण साफ दिखाई देता है जैसे विकृत यौन अनुभवों से जुड़े अपशब्दों का उच्चारण, जाति/धर्म/संप्रदाय/रंग/लिंग आदि के आधार पर विकृत कटु उक्तियाँ के माध्यम से श्रेष्ठता बोध को तुष्ट करना आदि, आपके उसी अवचेतन का परिचय है जो अब तक के जीवन में आपके अनुभवों और परिवेशजनित सामाजिक विकृतिओं के कारन उपजा है. किसी ने सही कहा है - "मनुष्य वह नही होता जो वह दिखाना चाहता है, वह होता है जो वह छुपाना चाहता है". हमारा अवचेतन इन्ही दबी- छुपी कुंठाओं को भावनात्मक विचलन के वक्त खुल कर सामने रखता है.

इस बात में कोई दोराय नही है की सामाजिकता के अपेक्षाकृत बहुत उच्च स्तर पर पहुँच कर भी मानव अवचेतन स्थिरता के उस सोपान पर नही पहुँच पाया है जहाँ वह संविभाजन अथवा अपखंडन के लिए अभेद्य/असाध्य हो. कई बार ऐसा होता है की सचेतन से अवचेतन की यह पृथकता एक समय में हमारे मस्तिष्क को दो अलग चीजों पर में कार्य कर पाने की क्षमता देती है. परोक्ष रूप से चल रहे अवचेतन के कार्य से हमारा सचेतन अनभिज्ञ होता है. बाद में जब कभी अवचेतन को अभिव्यक्ति का मौका मिलाता है वह अनुभव/विश्लेषण सामने आता है (इसलिए कई समस्याओं का हल हमें सपनों में मिलता है). वहीँ दूसरी ओर भावनात्मक विचलन की दशा में चेतना, अवचेतन द्वारा पूर्व निर्धारित मान्यताओं/स्थापनाओं के बोझ तले कुचली जाती है. यह अवचेतन द्वारा स्वतःप्रसूत (spontaneously) और अनायास होता है इसमें सचेतन की कोई भूमिका नही होती. जब यह प्रक्रिया पूर्ण तीव्रता के साथ अपने चरम पर पहुंचती है इसे चेतना का लोप होना (पुरातन काल में loss of soul) कहते हैं.

सामूहिक चेतना-लोप भी इसका एक महत्वपूर्ण उदहारण है जो कई रूपों में हमारे सामने आता है..जैसे संप्रदाय विशेष के धार्मिक आयोजनों में चेतनाहीन होकर खुद को शरीरिक रूप से चोटिल करना, सामूहिक रूप से भूत/प्रेत/जिन्न अथवा देवी/देवता का आना (प्रेतबाधा), किशोरों/युवाओं का फ़िल्मी गानों अथवा कहानिओं के प्रभाव में सामूहिक आत्महत्याएँ करना, दक्षिण भारत के लोगों का अपने प्रिय नेता अथवा अभिनेता की मृत्यु के कारण श्रृंखलाबद्ध रूप से आत्महत्या करना. ये सब हमारे अवचेतन में पहले से संग्रहीत उन स्थापनाओं का कार्य होता है जो हमारे व्यक्तित्व का महिमामंडन हमारे परिवेश और उपस्थित जनसमूह के आगे करती है. इसी महिमामंडन के कारण मिले आनन्द से प्रेरित होकर हमारा अवचेतन इन चीजों के प्रति आकर्षित होता है और विचलन की स्थिति में इसका साक्षात्कार करवाता है.

यह पोस्ट पूरी अवचेतन की कार्यशैली समझाने में ही निपट गई..मिथकों का जिक्र नही हो पाया...पर बिना इसे साफ किए आगे बढ़ना संभव नही था..फिर भी मुझे लगता है बात पूरी खुली नही होगी. मेरे लिए एक साथ इतना कुछ लिख पाना किसी महासागर को लोटे में समेटने के उपक्रम जैसा है..और कोई राह भी नही दिख पड़ती जिससे की चंद जैविक आवेगों से संचालित होकर पतन की राह पर चलते मानव को उसकी क्षमता का भान करवाया जा सके. हम अपने हिस्से की आहूति ही दे सकते हैं..वह दे रही हूँ..मैं आहत हूँ जो कुछ हाल में हुआ है हिंदी ब्लोगिंग में उससे ..आशा है आप इस पोस्ट के निहितार्थों को समझने की कोशिश करेंगे..अगर ऐसा कर पाएं मुझे ख़ुशी होगी..अगर नही..फिर भी हम अपना काम करते रहते हैं..खैर..आशा है अब आप अवचेतन की कार्यशैली ठीक प्रकार समझ गए होंगे..अब तक की व्याख्या में कहीं कोई समस्या हो तब पूछें..शेष चर्चा फिर कभी...



पिछली कड़ियाँ ..
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 1
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 2
मिथकों का मानव के अवचेतन पर प्रभाव - 3


27 comments:

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa January 1, 2010 6:25 AM  

आपको और आपके सारे परिवार को आने वाला समय सुख, समृद्धि और स्वास्थ्य प्रदान करे।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन January 1, 2010 7:34 AM  

"सामूहिक चेतना-लोप भी इसका एक महत्वपूर्ण उदहारण है..."
सामूहिक चेतनालोप नहीं होता है. सिर्फ पहले से चेतनाहीन लोग एक समूह में इकट्ठे हो जाते हैं. दंगा और आगज़नी भी इसी कोटि का एक अलग सा उदाहरण है.

नये वर्ष की शुभकामनायें!

लवली कुमारी / Lovely kumari January 1, 2010 7:39 AM  

सामूहिक चेतना-लोप - से मेरा आशय मास हिस्टीरिया (http://en.wikipedia.org/wiki/Mass_hysteria) है ..मुझे इसके लिए सही हिंदी शब्द नही मिला.

संगीता पुरी January 1, 2010 8:11 AM  

अवचेतन मन की परतें खोलती श्रृंखला का एक सशक्‍त लेख .. आपके और आपके परिवार के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !!

Udan Tashtari January 1, 2010 9:58 AM  

जारी रहिये..बड़ा रोचक विषय लग रहा है. आभार.

अर्कजेश January 1, 2010 11:08 AM  

मनोविज्ञान पर आधारित यह एक अच्‍छी श्रृंखला है । आपके रचनात्‍मक प्रयास की मैं प्रशंसा करता हूँ । इसी बात की आवश्‍यकता है कि निरर्थक विवादों में अपनी ऊर्जा नष्‍ट न की जाय और रचनात्‍मक लेखन किया जाय ।

मास हिस्टीरिया =
सामूहिक मानसिक व्‍याधि कहा जा सकता है क्‍या । यह सामूहिक अवचेतनिक सम्‍मोहन जैसा है ।

नव वर्ष की शुभकामनाओं सहित !

लवली कुमारी / Lovely kumari January 1, 2010 11:24 AM  

@अर्कजेश जी - "सामूहिक मानसिक व्‍याधि" कुछ ठीक नही लग रहा, क्योंकि मानसिक व्याधि के अन्दर कई और चीजें आ जाती है...अब लगता है शब्दकोश छानने ही होंगे इसके लिए..पिछली पोस्ट में मैंने सामूहिक वियोजन लिख दिया था मेरी दृष्टी में वह भी सटीक नही है.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi January 1, 2010 1:29 PM  

बहुत अच्‍छी चल रही है शृंखला। मैं कई दिन से अनुपस्थित था केवल पहली दो कडि़यां पढ़ी थी... अब तो यह रोचक और सरस होता जा रहा है।


समूह उद्वेग विकार कैसा शब्‍द है मास हिस्‍टीरिया के लिए...

Fighter Jet January 1, 2010 1:36 PM  

Completly agree with Smart Indian comment

वाणी गीत January 1, 2010 5:29 PM  

इसी प्रकार आपके भावनात्मक विचलनों (जैसे क्रोध, भय, असुरक्षाबोध आदि ) में आपके व्यक्तित्व का जो गुण साफ दिखाई देता है जैसे विकृत यौन अनुभवों से जुड़े अपशब्दों का उच्चारण, जाति/धर्म/संप्रदाय/रंग/लिंग आदि के आधार पर विकृत कटु उक्तियाँ के माध्यम से श्रेष्ठता बोध को तुष्ट करना आदि,.....

अवचेतन मस्तिष्क के क्रियाकलापों का हमारे शारीर और मन पर प्रभाव को आपने बहुत अच्छी तरह स्पष्ट कर दिया है ....बहुत आभार ...!!

नव वर्ष की बहुत शुभकामनायें ....!!

हिमांशु । Himanshu January 1, 2010 7:07 PM  

बेहद रोचक और जानकारी भरी आलेख-श्रृंखला ! आभार ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi January 1, 2010 8:25 PM  

मास हिस्टीरिया को हिन्दी में सामुहिक उन्माद कहेंगे।
आप को इस आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई। नए वर्ष की पूर्व संध्या पर हम ब्लाग जगत में पुरुषों का सामुहिक उन्माद देख चुके हैं। यह आलेख आगे से इस तरह की घटनाओं को समझने में मदद करेगा।

ताऊ रामपुरिया January 1, 2010 8:26 PM  

बहुत रोचक लगा, नये साल की घणी रामराम.

रामराम.

sanjaygrover January 2, 2010 12:33 AM  

"मनुष्य वह नही होता जो वह दिखाना चाहता है, वह होता है जो वह छुपाना चाहता है". हमारा अवचेतन इन्ही दबी- छुपी कुंठाओं को भावनात्मक विचलन के वक्त खुल कर सामने रखता है."
Kisiki kahi is baat ke sath achchha vishleshan aapne rakha hai.
Blog-jagat meN nav-varsh ki purv-sandhya par kya ghatna huyi us-se anbhigya huN.

रचना January 2, 2010 2:04 AM  

सशक्‍त लेख आपके और आपके परिवार के लिए भी नववर्ष मंगलमय हो !!

डॉ. मनोज मिश्र January 2, 2010 8:14 AM  

मैनें दोनों पोस्ट पढ़ ली ,काफी रोचकता लियें हैं .अच्छा लिख रहीं हैं आप ,बधाई .

mukti January 2, 2010 10:49 AM  

लवली जी,
मुझे आपकी यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी. एक बार पूरी श्रृँखला पढ़ूँगी, तब ठीक से पूरी बात समझ में आ पाएगी. मैं दिनेश जी की इस बात से सहमत हूँ कि मास हिस्टीरिया के लिये "सामूहिक उन्माद" शब्द का प्रयोग ही ठीक होगा, आगे जैसा आप ठीक समझें.
नव वर्ष की बहुत सी शुभकामनाओं के साथ...!!

vinay January 3, 2010 6:29 AM  

बहुत अच्छा लेख,महिमामडंन किसे कहतें हैं,इस शब्द का मतलब समझ में नहीं आया,हो अगर आप इस शब्द का अंग्रेजी अनुबाद कर दें,तो संमभत: समझ में आ जाये,में भी तीन दिन से अनुउपस्थित था,नववर्ष को क्या हुआ,इस बात से में भी अनभिज्ञ हूँ ।

आपको और सब पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाये,आशा करता हूँ,कि इस वर्ष से लेकर हर वर्ष के लिये सह्रदयता और सनेह बना रहे ।

समय January 5, 2010 2:17 AM  

श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण पायदान।
यहां से खडे़ होकर कई चीज़ें साफ़ नज़र आ सकती हैं, कोई चाहे तो।

बेहतर प्रस्तुति।

अभिषेक ओझा January 5, 2010 4:08 AM  

लोटा है तो ज्यादा नहीं तो कम से कम ग्लास भर तो हम भी समझते ही चल रहे हैं.

Suman January 5, 2010 8:09 AM  

nice

Satyendra Kumar January 13, 2010 5:54 AM  

Oh It is a nice blog and one of the best post ( (i found ever )on Psychology .

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी January 27, 2010 2:43 AM  

bahut hi achchhi post......

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' February 10, 2010 6:33 AM  

Wah sukun se dekhata hoon

ravi ranjan kumar February 10, 2010 11:52 AM  

आप अच्छा लिखती हैं , अच्छा पढ़ती है, पर अछे कमेन्ट करती है - यह सबसे अच्छा है.

manu June 28, 2010 5:39 AM  

गहराई से विचार कर के लिखा गया लेख...

बाकी लेखों के लिए भी समय निकालना पड़ेगा..

vinay August 3, 2010 4:00 AM  

लवली जी सामुहिक हिस्टिरिया को सामहुकि मिर्गी कहतें हैं,और कुछ मनोवेगयानिक से संबध होने के कारण में अक्सर अबचेतन का प्रभाव देखा है,इसिलिये में कोई व्यक्ति असमान्य व्यवहार कर रहा हो,बेशक मेरे साथ,में धैर्य और संयम से काम लेता हूँ,और उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का अपनी ओर से मानसिक विशलेशन करने का प्रयास करता हूँ ।

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