मनुष्य, जैव रसायन और व्यवहारवाद

इन दिनों ब्लॉग जगत में व्यवहार वाद और जैव रसायन के आधार पर मनुष्य को स्वभाव को परखने का दौर चला हुआ है। मैंने सोंचा इस पर मैं भी कुछ कह लूँ । १९५० के दशक में व्यवहारवाद की आलोचना आरम्भ हुई. जैसा की हम जानते हैं व्यवहारवाद में मनुष्य को वातावरण के उद्दीपको के प्रभाव को निरपेक्ष भाव से ग्रहण करने वाला एक यांत्रिक प्राणी माना जाता है. पशुओं से इतर उसकी विशिष्ट मानवीय क्षमताओं को कोई महत्व नही दिया जाता.

व्यवहारवाद की कटु आलोचना करते हुए bugental ने कहा की व्यवहारवाद ने मनुष्यों को एक बड़ा चूहा या एक मंद कंप्यूटर के तुल्य कर दिया है. इन व्यवहारवादिओं के विपरीत बहुत से मनोवैज्ञानिकों का मानना था की मनुष्य की प्रवृति आत्म सिद्धि (self actulization) से युक्त होती है और अगर पर्यावरणी अवस्थाएं अनुकूल होती है हों तो व्यक्ति पाशविक मूल प्रवृतिओं से नियंत्रित न होकर खुद को उपयोगी साबित करने में सक्षम होता है. यह फ्रायड के निराशावादी और मूल प्रवृति से युक्त मनुष्य की संकल्पना से अलग अधिक सार्थक और विश्वशनीय मान्यता है.मनोविज्ञान में इस विचार ने धीरे -धीरे आन्दोलन की शक्ल ले ली. इस मान्यता के समर्थक व्यक्ति के जैविक आवश्यकताओं और मूल प्रवृति की तुष्टि से अलग आत्म सिद्धि को जीवन के लक्ष्य के रूप में व्याख्यायित करते हैं.

अब थोडा ध्यान हम इस पर देते हैं की क्या पशुओं में सिखने की क्रिया के साथ कोई तार्किकता जुडी होती है?
थार्नडाइक ने इस दिशा में कई प्रयोग किये जिसके आधार पर उन्होंने अपने निष्कर्ष सामने रखे. उन्होंने बताया की पशुओं में सिखने की प्रक्रिया एक क्रमिक और यांत्रिक प्रक्रिया है जिसमे कोई तार्किकता नही पाई गई. पशुओं में सही अनुक्रिया कई प्रयासों से स्थापित होती है, और गलत प्रयोगों की संख्या धीरे धीरे कम होती जाती है. इसमें पशुओं में किसी प्रकार की सूझ (insight)अथवा तर्कपूर्ण चिंतन का प्रमाण नही मिलता है. थार्नडाइक ने अपना निष्कर्ष इन शब्दों में सामने रखा - "...failed to find any act that even seemed due to reasoning"

इसी प्रकार जैव आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद पशुओं का कोई भी कार्यकलाप उद्देश्यपूर्ण नही रह जाता है. निष्कर्ष स्वरुप हम कह सकते हैं की मानव की मनः स्थति पर सटीक टिप्पणी अथवा उसके व्यवहार/स्वभाव का निर्धारण जैव रसायनों की भूमिका अथवा व्यवहारवाद के आधार पर नही किया जा सकता. इसके लिए मनुष्य के अन्य उद्देश्यपूर्ण व्यवहारों के अध्ययन, सामाजिक अंतर्संबंधों और सास्कृतिक कार्यकलापों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है . व्यवहारवादी दृष्टिकोण के आधार पर हम मानव की चेतना और उसके व्यवहार को समझने और नियंत्रित करने में पुर्णतः असक्षम हैं क्योंकि जो मौलिक विशेषताएं उसे पशुओं से अलग मनुष्य के रूप में पहचाने जाने के योग्य बनती हैं, जैसे की भाषा, सामाजिकता, कला, आदर्श, हास्य बोध, चिंतन, तर्कणा, अपने अस्तित्व का ज्ञान, जीवन तथा मृत्यु का ज्ञान,किसी समस्या के समाधान में समय तथा दक्षता का ध्यान, अदि का पशुओं में सर्वथा आभाव होता है.

व्यवहारवाद ने व्यक्ति के इन मानवीय लक्षणों को अनदेखा करके संसार में उसे या तो एक पशु या फिर एक ऐसी मशीन के समकक्ष ला खड़ा किया जो अनुबधित और निरपेक्ष है तथा अनुबंधित प्रतिवर्तों की एक श्रृंखला मात्र है. व्यवहार वाद मानव प्रवृति के अध्ययन और इसके बारे में सही और निश्चित संकेत दे पाने में असमर्थ है. मानव की अन्य विशेषताओं को अनदेखा करते हुए केवल जैव रासायनिक दृष्टी से मानव स्वभाव का विश्लेषण और अध्ययन भी निहायत ही अज्ञानतापूर्ण और असंगत है और जैव रासायनिक अथवा व्यवहारवादी दृष्टिकोण से मानव का मूल्यांकन मानव को पशुत्व की ओर जबरन धकेलने के बाजारवादी उपक्रम से अधिक कुछ नही है.

20 comments:

mukti March 6, 2010 9:24 PM  

मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ "निष्कर्ष स्वरुप हम कह सकते हैं की मानव की मनः स्थति पर सटीक टिप्पणी अथवा उसके व्यवहार/स्वभाव का निर्धारण जैव रसायनों की भूमिका अथवा व्यवहारवाद के आधार पर नही किया जा सकता. इसके लिए मनुष्य के अन्य उद्देश्यपूर्ण व्यवहारों के अध्ययन, सामाजिक अंतर्संबंधों और सास्कृतिक कार्यकलापों पर भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है."
इसी प्रकार मैं जैविक निर्धारणवाद के भी विरुद्ध हूँ, जो मानव को पशु के स्तर पर ले आता है. मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसके साथ ही वह आत्मचेतना संपन्न भी है. यदि हम इन बातों को मानते हैं, तो हमें उसके व्यवहार में तार्किकता दिखेगी, जिसके आधार पर अनेक समस्याओं के मूल को ढूँढ़कर उन्हें दूर करने का प्रयास किया जा सकता है.

अखिल कुमार March 6, 2010 9:32 PM  

matlab ab koi apae blog par aapaki marzii kii baate likhe?

Hunh!!!!!!!

सुजाता March 6, 2010 10:02 PM  

ठीक कहा लवली !मुझे लगता है कि चोखेरबाली की इस पोस्ट http://blog.chokherbali.in/2010/03/blog-post_05.html

पर आए मेरे व ab inconvenienti के कमेंट्स को इस पोस्ट के सन्दर्भ मे भी देखना चाहिए ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi March 6, 2010 10:17 PM  

सही है, यदि केवल जैव रासायनिक दृष्टिकोण से मानव स्वभाव का अध्ययन किया जाना उचित नहीं है। इस तरह आए निष्कर्ष यांत्रिक ही होंगे।

तनु श्री March 6, 2010 11:10 PM  

मौलिक विशेषताएं उसे पशुओं से अलग मनुष्य के रूप में पहचाने जाने के योग्य बनती हैं, जैसे की भाषा, सामाजिकता, कला, आदर्श, हास्य बोध, चिंतन, तर्कणा, अपने अस्तित्व का ज्ञान, जीवन तथा मृत्यु का ज्ञान,किसी समस्या के समाधान में समय तथा दक्षता का ध्यान, अदि का पशुओं में सर्वथा आभाव होता है.
bahut achha likha,iske liye aabhar.

शरद कोकास March 6, 2010 11:33 PM  

मनुष्य के स्वभाव और उसकी जीवन पद्धति की पड़ताल व्यवहारवाद से सम्भव नहीं है । सामान्य रूप से भी पशुओं और मनुष्य के व्यवहार की तुलना करते हुए हम इसे देख सकते हैं । आदिम मनुष्य ने अपनी चेतना और आत्मसिद्धी तथा निरंतर परिक्षणों के आधार पर जीवन पद्धति और स्वभाव विकसित किया है फलस्वरूप वह अपनी जैविक पृवत्तियों से इतर पर्यावरण से विरोध और सामंजस्य के द्वन्द्व के साथ वर्तमान स्थिति तक पहुंचा है । यह सर्वमान्य बात है कि उसे पशु वा यंत्र के समकक्ष नहीं रखा जा सकता यद्यपि उसकी अस्मिता पर प्रहार किये जा रहे हैं और यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है । इस बात की ओर आपने स्पष्ट संकेत भी किया है ।
मैं सिर्फ यह बात इसमे जोड़ना चाहूँगा कि यह अनायास ही घटित नहीं हो रहा है अपितु षड़यंत्रपूर्वक विभिन्न माध्यमों से यह किया जा रहा है । बाज़ारवाद भी इसी व्यवस्था की देन है जिसमें मनुष्य को एक वस्तु की तरह भी निरुपित किया जा रहा है । लेकिन यह मनुष्य की चेतना ही है कि वह इस षड़यंत्र की पड़ताल कर सकती है इसलिये कि मनुष्य ने यह सब (भाषा, सामाजिकता, कला, आदर्श, हास्य बोध, चिंतन, तर्कणा, अपने अस्तित्व का ज्ञान, जीवन तथा मृत्यु का ज्ञान,किसी समस्या के समाधान में समय तथा दक्षता का ध्यान ) अपने श्रम से अर्जित किया है और इसका व्यर्थ हो जाना उसे स्वीकार नहीं है । उसकी यही स्वभावगत विशेषता उसके भविष्य का निर्धारण कर सकती है ।

अनूप शुक्ल March 7, 2010 8:01 AM  

लब्बोलुआब यह की मनुष्य मशीन नहीं है। आत्म सिद्धि की प्रवृत्ति और अनुकूल माहौल से वह अपने को बेहतर बना सकता है। अच्छा है। समझ गये बूझ भी गये। सुन्दर!

अनूप शुक्ल March 7, 2010 8:05 AM  

सुन्दर! लब्बोलुआब यह है कि मनुष्य एक मशीन नहीं है। अपनी आत्म सिद्धि की प्रवृत्ति और अनुकूल वातावरण मिले तो वह अपनी स्थिति में उपयोगी बदलाव/सुधार कर सकता है।
अच्छी पोस्ट!

अभिषेक ओझा March 7, 2010 8:18 AM  

बात तो बिलकुल सही है, मानव के व्यवहार और सोच को प्रभावित करने वाले अनेकों कारण हैं. इन्हें बस किसी भी एक प्रक्रिया में समेटना तो बेवकूफी ही है !

निर्मला कपिला March 11, 2010 8:02 PM  

लवली जी आपको जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई। पोस्ट भी बहुत अच्छी लगी। धन्यवाद्

मयंक March 12, 2010 3:27 AM  

जन्मदिन की शुभकामनाएं....

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर March 12, 2010 9:18 AM  

लवली जी आपको जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई, शुभकामनाएं....

अशोक कुमार पाण्डेय March 14, 2010 3:33 AM  

गंभीर और ज़रूरी आलेख। कृपया अपना मेल एड्रेस एक बार और भेजें।

डॉ महेश सिन्हा March 17, 2010 7:47 AM  

मनुष्य एक विकसित जानवर के अलावा भी कुछ और है जिसका ज्ञान हमारे पूर्वजों को हमसे ज्यादा था इसीका नाम आध्यात्म है . आज लेकिन महानगरों में जो जीवन शैली विकसित हो रही है उसे क्या नाम देंगे - बाजारवाद

KAVITA RAWAT April 8, 2010 10:05 PM  

Gyanvardhak post .
Bahut saarthak prayas..
Bahut shubhkamnayne.

girish pankaj April 21, 2010 6:50 AM  

achaanak aaj ek naye blog se meraa parichay hua. aap jaise vaishay uthaa rahi hai, vaise vishay kam log uthaa tahe hai, aur likh rahe hai. aapke saare lekhon ko ab dheere-dheere parhoongaa. kuchh gyaan barhegaa. badhaai, chintan ke naye aayaamon ke liye...

kshama April 21, 2010 10:48 PM  

मानव की अन्य विशेषताओं को अनदेखा करते हुए केवल जैव रासायनिक दृष्टी से मानव स्वभाव का विश्लेषण और अध्ययन भी निहायत ही अज्ञानतापूर्ण और असंगत है और जैव रासायनिक अथवा व्यवहारवादी दृष्टिकोण से मानव का मूल्यांकन मानव को पशुत्व की ओर जबरन धकेलने के बाजारवादी उपक्रम से अधिक कुछ नही है.
Sahi nishkarsh hai...waise manushy swabhav itna jatil hai,ki, uska thaah lagta kahan hai?

Manish April 23, 2010 7:06 PM  

आपके कुछ पैराग्राफ कॉपी करके अपने दोस्त, और लघु शोध कर रही अपनी दीदी को दे सकता हूँ....?? ये दोनों, मनुष्य, जैव रसायन और व्यवहारवाद और मानव व्यवहार की जटिलताएं....... काफी ज्ञानवर्धक हैं......

लवली कुमारी/Lovely kumari April 25, 2010 4:11 AM  

@मनीष - वैसे इस विषय पर काम कर रही हूँ और यह उसकी ही कड़ी है आगे इसके प्रकाशन की योजना है ..फिर भी आप कुछेक पैराग्राफ कापी कर ही सकते हैं :-).

नरेन्द्र व्यास June 6, 2010 2:35 AM  

आदरणीया लवली जी ! 'मनुष्य, जैव रसायन और व्यवहारवाद' विषयक समग्र विवेचन बहुत अच्छा लगा..

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