मानव के व्यवहार का अध्ययन करते समय हम कई विषयों में वर्णित मान्यताओं और मतों की मदद लेते हैं, जैसे न्यूरोलाजी, सोसियॉलाजी, जीवविज्ञान, पशु मनोविज्ञान, भौतिकी, दर्शनशास्त्र, धर्म विज्ञान (Theology) आदि । Ethology भी इनमे से एक है । मनोविज्ञान का जो संप्रदाय Ethology से सबसे अधिक प्रभावित रहा है, वह व्यवहारवादियों का माना जाता है । मनुष्य को पशुओं के सदृश मानकर उन्हें सामाजिकता से दूर करके, पशुओं के बीच अध्ययन करने को यह शाखा सही मानती है। इसके कई घातक परिणाम हुए हैं । B.F.skinner एक महान व्यवहारवादी थे, उन्होंने चूहों और कबूतरों पर प्रयोग करते-करते अपनी बेटी को भी स्किनर बॉक्स में ढाई साल की उम्र तक रख छोड़ा । वह न्यूरोटिक हो गई । इस विषय पर एक अच्छा लेख मुझे नेट पर मिला, दोहराव से बचने के लिए मैं उसे यहाँ नही लिख रही हूँ। यहाँ एक सन्दर्भ देना उचित समझती हूँ - हमारे एक मित्र, Desmond Morris महोदय के निष्कर्षों को मानव व्यवहार को परखने का आधार समझते हैं और वे किसी भी प्रकार उन्हें आलोचना के योग्य नही समझते । Morris महोदय पर एकांगी और तथ्यहीन उपन्यासनुमा लेखन के कारण छद्म विज्ञानी और पूर्वाग्रही होने के आरोप भी लगे हैं । किसी भी व्यक्ति द्वारा दिए गए कथन को सही मानने एवं उसका सामान्यीकरण करके पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करने वाले लेखक से इतनी उम्मीद जरुर की जानी चाहिए कि वे समग्र रूप से सारी चीजों पर प्रकाश डालेंगे, न कि अपने व्यक्तिगत कारणों से पाठकों से बेईमानी करेंगे । यह लेखन के उसूलों के सर्वथा विपरीत है और एक लेखक के लिए अक्षम्य अपराध है. साथ ही इस तरह का लेखन केवल अपनी प्रवृत्तियों को एन-केन-प्रकारेण सही ठहराने के लिए विद्वानों के मतों को तोड मरोड कर पेश किए जाने का कलुषित षडयंत्र है ।
आइये जाने क्या है जीव विज्ञान में reflexes की परिभाषा -
जब बाहरी वस्तुएं संवेद अंगों के nerve endings पर क्रिया करती हैं, तो तंत्रिका प्रणाली के जरिए नियंत्रित जैव-विद्युत आवेग (संकेत) मस्तिष्क को प्रेषित किये जाते हैं। वे कई जटिल भौतिक-रासायनिक परिवर्तनों को उभारते हैं, जिनके दौरान प्राप्त संकेत परिवर्तित होता है और अंगी की जवाबी प्रतिक्रिया को जन्म देता है। इस संकेत के आधार पर मस्तिष्क तदनुरूप आंतरिक अंग या चलन-अंगों को एक जवाबी आवेग प्रेषित करता है, जिससे सर्वाधिक सोद्देश्य क्रिया संपन्न होती है। इसके कुछ उदहारण आपको यहाँ मिलेंगे ।
अब जरा मानव मनोविज्ञान में सहज वृति देखते हैं।
सहजवृत्ति, reflex action का ही एक आद्य निरूपण है। उनका श्रृंखलित स्वरूप होता है और उनकी बदौलत ही जीव एक के बाद एक अनुकूलनात्मक क्रियाएं करता है।सहजवृत्ति-जन्य क्रियाएं कुछ निश्चित परिस्थितियों से जुड़ी होतीहैं, और प्रतिवर्तों की श्रृंखला का एक आनुवांशिक प्रोग्राम बन जाती हैं। यही बात इनकी सीमाएं प्रदर्शित करती है, क्योंकि परिस्थितियों के मानक रूप में परिवर्तन आते ही, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं अपनी कार्यसाधकता खो बैठतीहैं। अतएव यह कहा जा सकता है कि सहजवृत्तियां, परावर्तन ( reflex action ) क्षमता को सीमित कर देती हैं।
सीधे शब्दों में , व्यक्ति को अपने अवचेतन से कई प्रकार के सिग्नल्स मिलते हैं । हम तब तक उन आवेगों को महत्व नही देते, जब तक उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नही प्राप्त होती, परंतु प्रतिक्रिया प्राप्त होते ही धीरे -धीरे हम उस प्रवृति को व्यवहार में उतारना आरम्भ कर देते हैं । यह दोहराव बार-बार होता है और अंततः यह हमारी सचेतनता के संज्ञान में आये बिना सहजवृति का रूप ले लेती है । यह पूर्णतः अधिगम के फलस्वरूप विकसित होती है । इससे आनुवांशिकता का कोई सीधा सम्बन्ध नही होता है। हाँ, कई बार ऐसा देखा गया है कि उसी समान वातावरण में रहने के कारण जिनमें उनके माता-पिता रहते थे, संतान में वह प्रवृतियाँ विकसित होती हैं जो उनके माता/पिता में थीं । यहाँ वातावरण से अनुक्रिया के फलस्वरूप धीरे-धीरे विकसित हुए एक विशेष गुण को सहज वृति की संज्ञा दी जाती है. यह जटिल मानवीय गुण होता है, जिसमें कई काम्प्लेक्स प्रतिवर्ती, भावनात्मक और अवचेतनिक संवेगों का मिश्रण होता है । यहाँ एक उदाहरण लेना रोचक होगा - हमारे एक काबिल मित्र कहते हैं कि "विदेशों के कितने ही टोपलेस महिला बैरा को रेस्टोरेंट मे उन्हें ग्राहकों से अपने स्तन अग्रकों को बचाए रखने की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है -सहज बोध एक बुद्धिरहित आवेगपूर्ण व्यवहार है ।" इनका मानना है कि यह आनुवांशिक, सरल, बुद्धिहीन और सहज है । यह कितना क्लिष्टकल्पनामूलक तर्क है, इसका अंदाजा आप इसी उदाहरण के दूसरे पहलू पर ध्यान देकर लगा सकते हैं - आदिवासी समुदायों में कमर के उपर या तो एक पारभाषी कपडे का आँचल लिया जाता है अथवा कई बार वे लोग सिर्फ कमर के नीचे ही कपडे पहनते हैं । कमर के ऊपर का भाग खुला ही छोड़ दिया जाता है ..अगर तथाकथित रूप से यह आनुवांशिक और बुद्धि रहित व्यवहार होता, तो अब तक सारी आदिवासी महिलाओं का अंग भंग तो हो ही गया होता क्योंकि उन्हें ट्रेनिग देने वाला तो कोई है नहीं । हम मनोविज्ञान में दर्शन के कई समुदाय से मिलते जुलते नाम वाले सम्प्रदायों का अध्ययन करते हैं । जैसे एक उदाहरण संरचनावाद का ले सकते हैं । कितनी बेतुकी बात होगी यदि मैं इसे पढ़कर निकाले गए निष्कर्षों को दर्शन पर जबरन थोपना चाहूंगी? किसी निष्कर्ष को सामने रखते हुए ..हमें विषयांतर से टर्मिनोलाजी में हुए फर्क का ध्यान रखना ही चाहिए ।
कई तथ्य हैं, जो मनुष्यों को वानरों (यहाँ वानरों का उदाहरण इसलिए लिया जा रहा है कि वे मनुष्य के सबसे करीबी संरचना वाले रिश्तेदार समझे जाते हैं) से अलग करते हैं, पर जो सबसे सारभूत चीजें हैं वे श्रम और वाणी हैं ।मस्तिष्क और उसके सहवर्ती ज्ञानेन्द्रिओं के विकास, चेतना की बढ़ती स्पष्टता, विविक्त विचारण तथा विवेक की शक्ति की प्रतिक्रिया ने श्रम और वाणी दोनों को ही निरंतर विकसित होते जाने के लिए नए मौके दिए । पूर्ण विकसित मानव के उदय के साथ एक नए तत्व समाज ने जन्म लिया । जिससे मानव के विकास को अग्रगति की प्रबल प्रेरणा मिली । इसी के साथ उसके पाशविक वृत्ति में कमी आती गई, उसने परिवार जैसी इकाई की स्थापना की, धर्म जैसी अवधारणा बनाई । एक वयस्क मनुष्य के व्यवहार के सटीक पूर्वानुमान के लिए उसके मस्तिष्क में जमा स्मृतिओं और वातावरण से अनुक्रिया करके विकसित की गई चेतना का अध्ययन बहुत आवश्यक है । इस काम के लिए कई बार बने बनाए नियमों एवं बँधी-बँधाई मान्यतों से आगे निकलना होता है । यही मनोविज्ञान का कार्य क्षेत्र है । जिस किसी विषय की मान्यतों को हम इसमें अधिग्रहित करते हैं, यह ध्यान देना आवश्यक होता है कि हम उसमें और मनोविज्ञान की आधारभूत संकल्पनाओं में संतुलन बना पा रहे हैं या नहीं । यदि यह नहीं होता तो हमारे निष्कर्ष एकांगी हो जाते हैं, जिनकी कोई उपयोगिता नही रह जाती । पशुओं और मानवों के व्यवहार के तुलनात्मक अध्ययन के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पशुओं के व्यवहार को हम सिर्फ मानव के सरलतम व्यवहार को समझने की कुंजी की तरह लें । न कि पशुओं के व्यवहार के आधार पर धारणाएं बना कर मानव को पशु साबित करें और उसकी पाशविक अमानवीय हरकतों को जायज ठहराएँ । यह वृत्ति उन्ही व्यक्तियों में हो सकती है जो इसका इस्तेमाल करके अपने पाशविक कुकृत्यों पर आवरण डालना चाहते हैं । उसे सही ठहरा कर सामाजिक और न्यायिक दंड से बचना चाहते हैं ।
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आइये जाने क्या है जीव विज्ञान में reflexes की परिभाषा -
जब बाहरी वस्तुएं संवेद अंगों के nerve endings पर क्रिया करती हैं, तो तंत्रिका प्रणाली के जरिए नियंत्रित जैव-विद्युत आवेग (संकेत) मस्तिष्क को प्रेषित किये जाते हैं। वे कई जटिल भौतिक-रासायनिक परिवर्तनों को उभारते हैं, जिनके दौरान प्राप्त संकेत परिवर्तित होता है और अंगी की जवाबी प्रतिक्रिया को जन्म देता है। इस संकेत के आधार पर मस्तिष्क तदनुरूप आंतरिक अंग या चलन-अंगों को एक जवाबी आवेग प्रेषित करता है, जिससे सर्वाधिक सोद्देश्य क्रिया संपन्न होती है। इसके कुछ उदहारण आपको यहाँ मिलेंगे ।
अब जरा मानव मनोविज्ञान में सहज वृति देखते हैं।
सहजवृत्ति, reflex action का ही एक आद्य निरूपण है। उनका श्रृंखलित स्वरूप होता है और उनकी बदौलत ही जीव एक के बाद एक अनुकूलनात्मक क्रियाएं करता है।सहजवृत्ति-जन्य क्रियाएं कुछ निश्चित परिस्थितियों से जुड़ी होतीहैं, और प्रतिवर्तों की श्रृंखला का एक आनुवांशिक प्रोग्राम बन जाती हैं। यही बात इनकी सीमाएं प्रदर्शित करती है, क्योंकि परिस्थितियों के मानक रूप में परिवर्तन आते ही, सहजवृत्तिमूलक क्रियाएं अपनी कार्यसाधकता खो बैठतीहैं। अतएव यह कहा जा सकता है कि सहजवृत्तियां, परावर्तन ( reflex action ) क्षमता को सीमित कर देती हैं।
सीधे शब्दों में , व्यक्ति को अपने अवचेतन से कई प्रकार के सिग्नल्स मिलते हैं । हम तब तक उन आवेगों को महत्व नही देते, जब तक उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया नही प्राप्त होती, परंतु प्रतिक्रिया प्राप्त होते ही धीरे -धीरे हम उस प्रवृति को व्यवहार में उतारना आरम्भ कर देते हैं । यह दोहराव बार-बार होता है और अंततः यह हमारी सचेतनता के संज्ञान में आये बिना सहजवृति का रूप ले लेती है । यह पूर्णतः अधिगम के फलस्वरूप विकसित होती है । इससे आनुवांशिकता का कोई सीधा सम्बन्ध नही होता है। हाँ, कई बार ऐसा देखा गया है कि उसी समान वातावरण में रहने के कारण जिनमें उनके माता-पिता रहते थे, संतान में वह प्रवृतियाँ विकसित होती हैं जो उनके माता/पिता में थीं । यहाँ वातावरण से अनुक्रिया के फलस्वरूप धीरे-धीरे विकसित हुए एक विशेष गुण को सहज वृति की संज्ञा दी जाती है. यह जटिल मानवीय गुण होता है, जिसमें कई काम्प्लेक्स प्रतिवर्ती, भावनात्मक और अवचेतनिक संवेगों का मिश्रण होता है । यहाँ एक उदाहरण लेना रोचक होगा - हमारे एक काबिल मित्र कहते हैं कि "विदेशों के कितने ही टोपलेस महिला बैरा को रेस्टोरेंट मे उन्हें ग्राहकों से अपने स्तन अग्रकों को बचाए रखने की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती है -सहज बोध एक बुद्धिरहित आवेगपूर्ण व्यवहार है ।" इनका मानना है कि यह आनुवांशिक, सरल, बुद्धिहीन और सहज है । यह कितना क्लिष्टकल्पनामूलक तर्क है, इसका अंदाजा आप इसी उदाहरण के दूसरे पहलू पर ध्यान देकर लगा सकते हैं - आदिवासी समुदायों में कमर के उपर या तो एक पारभाषी कपडे का आँचल लिया जाता है अथवा कई बार वे लोग सिर्फ कमर के नीचे ही कपडे पहनते हैं । कमर के ऊपर का भाग खुला ही छोड़ दिया जाता है ..अगर तथाकथित रूप से यह आनुवांशिक और बुद्धि रहित व्यवहार होता, तो अब तक सारी आदिवासी महिलाओं का अंग भंग तो हो ही गया होता क्योंकि उन्हें ट्रेनिग देने वाला तो कोई है नहीं । हम मनोविज्ञान में दर्शन के कई समुदाय से मिलते जुलते नाम वाले सम्प्रदायों का अध्ययन करते हैं । जैसे एक उदाहरण संरचनावाद का ले सकते हैं । कितनी बेतुकी बात होगी यदि मैं इसे पढ़कर निकाले गए निष्कर्षों को दर्शन पर जबरन थोपना चाहूंगी? किसी निष्कर्ष को सामने रखते हुए ..हमें विषयांतर से टर्मिनोलाजी में हुए फर्क का ध्यान रखना ही चाहिए ।
कई तथ्य हैं, जो मनुष्यों को वानरों (यहाँ वानरों का उदाहरण इसलिए लिया जा रहा है कि वे मनुष्य के सबसे करीबी संरचना वाले रिश्तेदार समझे जाते हैं) से अलग करते हैं, पर जो सबसे सारभूत चीजें हैं वे श्रम और वाणी हैं ।मस्तिष्क और उसके सहवर्ती ज्ञानेन्द्रिओं के विकास, चेतना की बढ़ती स्पष्टता, विविक्त विचारण तथा विवेक की शक्ति की प्रतिक्रिया ने श्रम और वाणी दोनों को ही निरंतर विकसित होते जाने के लिए नए मौके दिए । पूर्ण विकसित मानव के उदय के साथ एक नए तत्व समाज ने जन्म लिया । जिससे मानव के विकास को अग्रगति की प्रबल प्रेरणा मिली । इसी के साथ उसके पाशविक वृत्ति में कमी आती गई, उसने परिवार जैसी इकाई की स्थापना की, धर्म जैसी अवधारणा बनाई । एक वयस्क मनुष्य के व्यवहार के सटीक पूर्वानुमान के लिए उसके मस्तिष्क में जमा स्मृतिओं और वातावरण से अनुक्रिया करके विकसित की गई चेतना का अध्ययन बहुत आवश्यक है । इस काम के लिए कई बार बने बनाए नियमों एवं बँधी-बँधाई मान्यतों से आगे निकलना होता है । यही मनोविज्ञान का कार्य क्षेत्र है । जिस किसी विषय की मान्यतों को हम इसमें अधिग्रहित करते हैं, यह ध्यान देना आवश्यक होता है कि हम उसमें और मनोविज्ञान की आधारभूत संकल्पनाओं में संतुलन बना पा रहे हैं या नहीं । यदि यह नहीं होता तो हमारे निष्कर्ष एकांगी हो जाते हैं, जिनकी कोई उपयोगिता नही रह जाती । पशुओं और मानवों के व्यवहार के तुलनात्मक अध्ययन के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पशुओं के व्यवहार को हम सिर्फ मानव के सरलतम व्यवहार को समझने की कुंजी की तरह लें । न कि पशुओं के व्यवहार के आधार पर धारणाएं बना कर मानव को पशु साबित करें और उसकी पाशविक अमानवीय हरकतों को जायज ठहराएँ । यह वृत्ति उन्ही व्यक्तियों में हो सकती है जो इसका इस्तेमाल करके अपने पाशविक कुकृत्यों पर आवरण डालना चाहते हैं । उसे सही ठहरा कर सामाजिक और न्यायिक दंड से बचना चाहते हैं ।
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28 comments:
दी.... ह्यूमन साइकोलोजी पर यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी.... बहुत इन्नोवेटिवली आपने समझाया है..... आपकी अभी काफी पोस्ट्स देखीं.... सब फ़ाइल करने लायक हैं.... आज ही ऑफिस जाऊंगा तो सबका प्रिंट आउट ले लूँगा....
लवली जी ! अक्षर छोटे छोटे होने से पढने में दिक्कत हो रही है !
सहज बोध को कुछ अधिक स्पष्ट करने की आवश्यकता प्रतीत होती है उदाहरणों के माध्यम से। बहुत सारे सहजबोध इच्छा और अभ्यास से उत्पन्न नहीं होते?
पोस्ट का फोंट आकार बहुत छोटा हो गया है कृपया इसे बढ़ाएँ।
महत्वपूर्ण पोस्ट, साधुवाद
शोधपरक एवं ज्ञानवर्धक आलेख. आभार.
सहज और सरल प्रकार से लिखा हुआ,यह लेख अच्छा लगा ।
वाह बहुत सुन्दर लिखा है।
एक शोधपरक व्यवस्थित लेख. मैं इस लेख के निष्कर्षों से सहमत हूँ और मानती हूँ कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है... कुछ जैविक तथ्य हैं, जिन्हें अनदेखा नहीं किया जा सकता, पर इसके आधार पर उसे पशु की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता... यह प्रस्थापना ध्यातव्य है--
"पशुओं के व्यवहार को हम सिर्फ मानव के सरलतम व्यवहार को समझने की कुंजी की तरह लें । न कि पशुओं के व्यवहार के आधार पर धारणाएं बना कर मानव को पशु साबित करें और उसकी पाशविक अमानवीय हरकतों को जायज ठहराएँ ।"
@द्विवेदी जी- मैंने समय की पोस्ट का लिंक लगा दिया है...दोहराना नही चाहती थी.. फॉण्ट साइज भी बढ़ा दिया.
फोण्ट साइज बढ़ा देने के लिए धन्यवाद! अब ठीक है। हालाँकि इस से एक साइज और बड़ा होता तो ठीक रहता।
लवली जी,
मैं अरविंद शेष हूं। जनसत्ता के संपादकीय पेज पर इंटरनेट पर हिंदी सामग्रियों पर आधारित साभार दैनिक स्तंभ समांतर प्रकाशित होता है। इसमें आपके ब्लॉग के इस पोस्ट का अंश छापना चाहता हूं। आपके ब्लॉग पर स्वीकृति संबंधी चेतावनी लगी हुई है। इसलिए आपकी इजाजत की जरूरत है। क्या आपकी अनुमति मिल सकती है?
लवली जी फ़ाण्ट बहुत छोटे हैं…हम कमज़ोर नज़र वालों का ध्यान रखें
लेख बहुत जानकारी भरा है। मनोविज्ञान उन विषयों में से है जिसे मैने बहुत कम पढ़ा है। लेकिन सहज वृत्ति वाले सवाल पर आपसे सहमत हूं। वृत्तियां किसी दैवीय कारण से नहीं अपितु सामाजिक-सांस्कृतिक कारणो से विकसित होते हैं।
@अशोक जी - फॉण्ट साइज तो आप कंट्रोल बटन और "+" दबा कर बढ़ा लीजिये ..अब इसमें बहुत समय जाया होने वाला है अगर बढ़ाने जाऊं.
@ मुक्ति
क्या ये मुमकिन है कि जैविकता बनाम सामाजिकता की अवधारणा को हार्डवेयर बनाम साफ्टवेयर की तरह से समझाया जा सके ?
@ एल.गोस्वामी
सुचिंतित आलेख ! अकसर कोई अध्येता अपने विषयगत अनुशासन से इस तरह चिपक जाता है कि उसे अन्य अनुशासनों और उनकी चिंतन प्रणाली से उदघाटित सत्यों / स्थापित धारणाओं को खारिज करने के लिये किसी तर्क की आवश्यकता नहीं हुआ करती ...सच तो ये है कि बंद गलियों के इन्ही मुसाफिरों की वज़ह से ज्ञान विज्ञान की जान पर बन आई है ! सत्य को ...ज्ञान को ...विज्ञान को... बंद गलियां नहीं ...उन्मुक्त आकाश चाहिये...खुली आंखों...खुले मस्तिष्क ...और खुले डैनों से परवाज़ करते परिंदे चाहिये ...मेरा मतलब अंतर अनुशासनात्मक चिंतन धारा वाले अध्येता चाहिये ! समय आ गया है कि अपने अपने ज्ञान कूपों से बाहर निकला जाये !
बहुत अच्छा पठनीय एवं संग्रहणीय आलेख. आभार!
सारगर्भित आलेख।
विषय प्रवर्तन पर नियंत्रण और समुचित व्याख्याओं पर किया श्रम बखूबी झलक रहा है।
जाहिरा हो रहा है, कि नेट पर हिंदी में मनोविज्ञान पर एक बेहतर दृष्टिकोण के साथ उपलब्ध जानकारी का अभाव है, हालांकि यत्र-यत्र कुछ सूचनाएं बिखरी हुई मिल जाती हैं।
आप यह महती श्रम करती रहती हैं, और एक बेहतर दृष्टिकोण के लिए प्रतिबद्ध और सन्नद्ध हैं। आपकी यह उर्जा प्रभावित करती है।
‘समय के साये’ पर भी इन्हीं उद्देश्यों के तहत मनोविज्ञान पर एक श्रॄंखला शुरू की जा रही है। उसे भी संपूरित करती रहें।
शुक्रिया।
इस विषय मे मेरा ज्ञान उतना ही है, जितना मछली को साईकिल के बारे मे होता है। हर व्यक्ति को हर विषय का ज्ञान हो यह आवश्यक नही -- विशेषकर ऐसे जटिल विषय।
हाँ विकीपीडीया के सही गलत आलेखों को गूंथकर लेख लिख देना हिंदी मे प्रचलित होता जा रहा है। लेकिन यह नकलविधा हिंदी विग़्यान प्रसार के लिये घातक है। इससे बचना चाहिये, यदि कुछ कुप्रयास हो रहे हो तो उनका खडन आवश्यक है। नये अंधविश्वास के जन्म को रोकना अवाश्यक है।
मेरे लिये महत्वपूर्ण लेख। इस बात से पूर्ण सहमति कि ग़्यान बंद गलियों मे नही पनपता। वहाँ तो वह सडांध को जन्म देता है। संकीर्ण मानसिकता, किसी वैज्ञानिक निश्कर्ष को धर्म सरीखी मान्यता देना या उसे आस्था मान लेना पूर्णत: अवैज्ञानिक सोच है।
कई लोग अपने अनुकूल शोध कार्यों को तोड मरोड कर प्रस्तुत कर देते हैं -- अपनी धारणा के प्रचार के लिये। शराब के गुण गिनाये जाते हैं शोध के द्वारा।
आपका प्रयास सराहनीय है। शुभकामनायें।
@ अली जी, ये सही है कि जैविकता बनाम सामाजिकता की अवधारणा को हार्डवेयर बनाम सोफ्टवेयर के रूप में समझा जा सकता है, पर मानव कोई मशीन तो है नहीं, इसलिए ये अवधारणा ठीक-ठीक इस उदाहरण से परिभाषित होगी या नहीं, कह नहीं सकती. लवली इस पर सही ढंग से प्रकाश डाल सकती हैं. क्योंकि मुझे भी मनोविज्ञान विषय का ज्ञान नहीं है, मैं जो भी कहती हूँ अपने अनुभव, अन्य घटनाओं और अध्ययन के बल पर कहती हूँ...जैसा कि आपने कहा है "सत्य को ...ज्ञान को ...विज्ञान को... बंद गलियां नहीं ...उन्मुक्त आकाश चाहिये...खुली आंखों...खुले मस्तिष्क ...और खुले डैनों से परवाज़ करते परिंदे चाहिये ...मेरा मतलब अंतर अनुशासनात्मक चिंतन धारा वाले अध्येता चाहिये ! समय आ गया है कि अपने अपने ज्ञान कूपों से बाहर निकला जाये ""
मैं इस बात से सहमत हूँ... मानव विकास के क्रम को भी मात्र जैविक, मात्र मनोवैज्ञानिक या मात्र सामाजिक-सांस्कृतिक रूप में नहीं देखा जा सकता... इन सभी अनुशासनों को मिलाकर ही इस विकास प्रक्रिया को जाना जा सकता है... और उससे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. इसके लिए विभन्न अनुशासनों के मध्य अंतर्क्रिया अर्थात विशेषज्ञों के मध्य वाद-विवाद होते रहना चाहिए... पर अपनी हठधर्मिता छोडनी चाहिए.
विज्ञान की बंद गलियों के अध्येता ऐसे-ऐसे तर्क देते हैं जो बिल्कुल भी व्यावहारिक नहीं हैं. जैसे कि मैं कहती हूँ कि स्त्रियों से छेडछाड एक जटिल सामाजिक समस्या है, जिसमें अपराधी का पालन-पोषण, सामाजिक-सांस्कृतिक दशाएं, मनोवैज्ञानिक और जैविक सभी तथ्य हैं... ... और उनके अनुसाक ये मात्र मनोवैज्ञानिक और जैविक समस्या है... हमें किसी भी समस्या को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है, न कि लकीर पीटने की.
अच्छा आलेख ।
यह विषय विशेषज्ञों का है। उभय पक्ष को अतिवाद और अहम से बचना चाहिए। हाँ, आम जन को समझाने के लिए सरलीकृत आलेख जिनमें ह्यूमर और उदाहरणों के स्पर्श हों, आवश्यक हैं। एक ही मनुष्य अलग अलग परिस्थितियों में अलग अलग व्यवहार करता है क्यों कि मनुष्य का संघटन बहुत जटिल है।
@ {मेरे non-blogger पाठक कृपया इस पोस्ट को इग्नोर करें. }
ऐसा क्यों?
@गिरिजेश जी - क्योंकि इस पोस्ट में ऐसे सन्दर्भ हैं जिनसे वे संभवतः परिचित न होंगे.
सर्वप्रथम : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, इसलिए उसे समाज में रहने के लिए अनुशासन की दरकार होती है । ताकि उसी के तरह के अन्य मनुष्यों के साथ वह उसी सुविधा के साथ रह सके जैसा कि अन्य मनुष्य उसके साथ रहना चाहते हैं । अतएव किसी भी प्रकार के जैविक आवेग या सुनियोजित प्रक्रिया से उत्पन्न अपराध को न्यायोचित ठहराकर,
उस मनुष्य के सुधरने तक दण्ड की प्रक्रिया को स्थगित नहीं किया जा सकता । आत्म नियंत्रण मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के लिए एक प्रमुख गुण है ।
इसके बाद :
लेख इस सोच का प्रस्थान बिंदु है की एकांगी दृष्टिकोण किसी भी विषय का सही विश्लेषण प्रस्तुत नहीं कर सकता । आज हम अपने पूर्ववर्ती मनोवैज्ञानिकों की समृद्ध परंपरा के कारण मानव मन का अधिक गहराई से अध्ययन कर सकते हैं । बस जरूरत इस बात की है कि किसी सिद्धांत के प्रति आग्रही होने के स्थान पर हम विभिन्न प्रयोगों और प्रस्तावनाओं का परिस्थितियों अर्थात् केस के अनुसार समुचित प्रयोग कर सकें । और अपने मौलिक निष्कर्ष निकाल सकें ।
क्योंकि निरंतर प्रयोगों के द्वारा परिष्कृत होते रहना विज्ञान की जान है ।
मनुष्य के कोई भी क्रिया कलाप उसके आनुवांशिकी या परिवेश के किसी भी एक प्रभाव से प्रभावित नहीं होते । मनुष्य के व्यक्त्त्वि के ऊपर उसकी मनुष्य तक की विकास यात्रा के सारे चिन्ह प्रत्यक्ष-परोक्ष, चेतन-अचेतन रूप से विद्यमान होते हैं । इन सब के साथ साथ उसका परिवेश उसे बनाता है ।
लेकिन अन्तत: मनुष्य उस स्थिति तक पहुँची हुई चेतना होती है, जो विचार कर सकती है । अपनी स्थिति के बारे में सोच सकती है । जिसे स्वयं के होने का बोध होता है । वह संकल्प कर सकता है और परिस्थितियों पर विजय प्राप्त कर सकता है ।
मुख्यत: दो बातें मनुष्य को पशुओं से अलग करती हैं - स्वयं के होने का अहसास मनुष्य में होता है जिसे आत्मचेतना कहा जाता है । पशुओं में यह अनुपस्थित होती है । इसीलिए उनके लिए कल जैसा कुछ नहीं होता । चित्त ही नहीं होता । यह कहा जा सकता है कि पशुओं के लिए भूत और भविष्य नहीं होता । इसीलिए कोई पशु चिंतित नहीं होता । क्योंकि सारी चिंता भविष्य के बोध से पैदा होती है ।
दूसरा मनुष्य में पीढियों से अर्जित ज्ञान का अगली पीढी को हस्तांतरित हो जाना । जबकि हर पशु वहीं से शुरू करता है जहॉं से उसके किसी आदि पूर्वज ने शुरुआत की होगी ।
अरस्तु के कथन का विपरीत सत्य नहीं है कि पशु एक असामाजिक मनुष्य है ।
और
यदि मनुष्य पशु से विकसित भी हुआ है । तो क्या उसे फिर से पशु हो जाना चाहिए । क्या बुराइयों का महिमामंडन करना है । आगे जाना है कि पीछे जाना है ।
मनुष्य तो एक संभावना है । उसे हम जैसा चाहे बना सकते हैं । वह हिटलर मुसीलिनी भी बन सकता है और बुद्ध आइंस्टीन भी ।
एक बच्चे को हम उचित माहौल और शिक्षा के द्वारा ऐसा इंसान बना सकते हैं जो इस समाज को एक बेहतर जगह बनाने में योगदान दे सके । मनुष्य पशु के स्तर से भी नीचे गिर सकता है और सामान्य मनुष्य के स्तर से बहुत ऊंचा उठ सकता है । यह परिस्थितिगत है ।
पशु तो केवल पशु ही रहेगा । उसमें कोई संभावना नहीं है । न तो वह
पशुत्व से नीचे गिर सकता है और न ही ऊपर उठ सकता है । उसके अंदर कोई व्यक्तिव नहीं है ।
मनुष्य की जो क्षमता उसे ऊपर उठाती है वही उसे नीचे भी गिराती है । केवल दिशा की बात होती है ।
मनुष्य के अंदर यह बोध कहां से आता है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा कि तुम खुद नहीं चाहते हो कि कोई तुम्हारे साथ करे । क्या कोई पशु ऐसा सोच सकता है । मनुष्य एक संघर्ष है चेतना की ऊर्ध्वगति का ।
क्या पाशविक वृत्तियॉं होने का अर्थ यह है कि उन्हें स्वीकार करके
हत्यारों, बलात्कारियों और तालिबानों को न्यायोचित ठहरा दिया जाए ।
फिर तो मत्स्य-न्याय के अतिरिक्त कोइ रास्ता शेष नहीं बचता ।
धन्यवाद ।
आलेख से सहमत । जो पाठक सन्दर्भों से (संभवत: ) परिचित नहीं है वे परिचित होने के लिये श्रम करें इसलिये कि यह अभ्यास उन्हें इतर श्रेणि में दर्ज करेगा । पाशविक शब्द उन्ही की देन है जिनका उल्लेख आपने लेख की अंतिम पँक्तियों में किया है ।
अर्कजेश की टिप्पणी स्वयं में एक पोस्ट जैसी है...मैं उनके प्रेक्षण और निष्कर्ष से सहमत हूँ.
आपकी सोच में संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह ज्यादा हैं. जाने अनजाने आप कुतर्कों* का भरपूर प्रयोग कर रही हैं. बात मूल वृत्तियों की चल रही थी आपने स्किनर, थोर्नडाइक वगैरह क्या क्या बताना शुरू कर दिया.
आप सीधे सरल शब्दों में समझाएं की उत्क्रन्तिक मनोविज्ञान की किन स्थापनाओं से आप सहमत नहीं हैं और क्यों? भटकाव से बचें.
*कुतर्कों ----> fallacies
@ ab - जैसा की मैंने लिखा सहजवृत्तियां, मनुष्य के व्यवहार में reflex action क्षमता को सीमित कर देती हैं. यह सब कड़ियाँ आपस में जुडी हुई है,इसी कारण इन्हें विस्तार दिया गया है.
दूसरी बात मैंने साफ लिखा है - मनोविज्ञान का जो संप्रदाय Ethology से सबसे अधिक प्रभावित रहा है, वह व्यवहारवादियों का माना जाता है.इसी कारण उनका जिक्र हुआ है.
उत्क्रन्तिक मनोविज्ञान से क्या तात्पर्य लेते हैं ?
उत्क्रन्तिक मनोविज्ञान की किन स्थापनाओं किन स्थापनाओं को आप आधुनिक मनुष्यों के सापेक्ष देखते हैं ?
अच्छी प्रस्तुति........बधाई.....
काम्प्लेक्स, विशेषज्ञ और तार्किक पोस्ट. कुछ अंश याद रह जायेंगे.
पशुओं के व्यवहार को हम सिर्फ मानव के सरलतम व्यवहार को समझने की कुंजी की तरह लें। जीवों के व्यवहार और उनसे सीखने की बहुत सुन्दर बात कही, सही है, हम प्रकृति में इन्ही सब से तो सीखते आये है, मजाक में कहूं, तो शेर का शातिरानापन, गीद की भभकी, उल्ल्लू सी तेज नज़र, लोमड़ी की चालबाजियां, कौये की होशियारी, ..और न जाने क्य क्या......सुन्दर आलेख और सुन्दर लेखनी है आप की। आप को साधूवाद
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